आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)

आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)
Ayurved Ka Kamaal (Rogon Ke Nidan Mein)
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
DevanagariHindipublished112 पृष्ठ
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आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है जो तीन लोक का राजा, चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता है
- 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारौं में खाऊँ। जल थल नभ महँ रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥
- 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्कीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान ॥
- 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी ॥
- 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन निरंजन जानिये ॥
- 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भांति के, सुनि के मन ललचाया है ॥
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यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है ॥
- 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार है ॥
- 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए ॥
- 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा ॥
- 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई ॥
- 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥
—कबीर साहिब