आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
वायोंविद के बाद हिरण्याक्ष ने कहा किः—
हिरण्याक्षस्तुनेत्याह नक्षात्मा रसजस्मृतः । नार्ताद्रियं मनः संति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥
अर्थात् रस को पुरुषरोगोत्पादक कहना उचित नहीं है । क्योंकि आत्मा, रसज नहीं है; अर्ताद्रिय मन, रसज नहीं है और शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से पैदा होने वाले रोग भी रसज नहीं हैं ।
वायोंविद आत्मा को रसज कहते थे । वायोंविद को शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से रोगों का पैदा होना यद्यपि मान्य था तथापि उनका यह कथन था कि शब्दादि जन्म रोगों कि वह में सत्त्ववादी जिस सत्त्व को कारण मानते हैं वह सत्त्व भी जब कि रस से ही पैदा होता है तब रस ही इनका कारण है । हिरण्याक्ष ने वायोंविद के इन विधानों का ही प्रतिवाद किया है । प्रतिवाद के पश्चात् अब स्वकीय मत कहते हैं किः—
षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजः सांख्यैराद्यैः सम्पारिकीर्तितः ॥