भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

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आयुर्वेद-दर्शन

सिद्धांत का प्रजापतिवाद में और उसका भी पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धांत में किस प्रकार समन्वय हुआ। अस्तु।

शारीरधातुओं का तीसरा वर्गीकरण प्रायः लक्षणस्कंध से संबंध रखता है। इसका अस्पष्ट आरंभ यद्यपि ‘वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा’ (च. सू. अ. १७) इसमें दिखाई देता है तथापि उसका संशोधित रूप ‘दोष, धातु, मल, मूलं हि शरीरम्’ (सु. सू. अ. १५) इसीमें व्यक्त हुआ है। इसमें शारीरधातुओं के दोष, धातु और मल संज्ञक तीन प्रधान विभाग किये हैं।