भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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बार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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प्रकृतिभूताः पुरुषमन्यापत्रेन्द्रियं बलवर्णसुलोपपन्नमायुषा महता उपपादयति, सन्ध्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्यकांसा इव निःश्रेयसेन महता पुरुषमिहचामुष्मिन्न लोके, विकृतास्त्वेन महता विपर्य- येणोपपादयति ऋतवःक्षय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो- पधातकाल इति ।

इस पर से यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस परिपद में भारद्वाज को छोड़कर अन्य सब ऋषि, पंचात्मक लोकपक्षीय नहीं थे अपितु द्विधात्मक लोकपक्ष को त्रिधात्मक बनाने वाले थे । इसमें वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक स्वरूप पर विचार हुआ और उनका संबंध वायुअग्निसेमसंज्ञक जागतिक धर्मों के साथ प्रस्थापित किया गया । ये समस्त ऋषि गुर्विदि गुणों को प्रधान माननेवाले थे । इनमें कांकायन और पुनर्वसु आत्रेय आत्मा को स्वतःसिद्ध कहते थे और शेष सब ऋषि आत्मा और सत्व को रसज अथवा त्रिधातुज मानते थे । पुनर्वसु आत्रेय को (और कांकायन को भी) त्रिधात्वात्मक सिद्धांत यद्यपि स्वीकृत था तथापि सर्वांश में वे उससे सहमत नहीं थे । क्योंकि इसमें आत्मा या प्रजापति का स्वतः सिद्ध अस्तित्व नहीं माना जाता था, अतः उन्होंने अन्यत्रैकान्तिक 'वचनात्' कहकर अपने मत को सुरक्षित रक्खा ।

कुछ लोग दो बार्योविदों की कल्पना करते हैं पर वह कल्पना ही है । आगे चलकर हम देखेंगे कि इस त्रिधातु-