आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौशिक का परंपरावाद.
कौशिकः—षड्धातुवाद का खंडन करते हुए कौशिक ने यह कहा कि:—
तदुक्तवन्तं कुशिकमाह तच्चोति कौशिकः ।
कस्मान्मातापितृभ्यां हि विना षड्धातुजो भवेत् ॥
पुरुषः पुरुषाद्वौर्गोश्चादश्चः प्रजायते ।
पिन्ध्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्रकारणम् ॥
अर्थात् केवल षड्धातुसमुदाय से—इनका मिश्रण बना देने से पुरुष की अथवा रोगोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि हो सकती है तो वह बिना माता पिता के ही क्यों नहीं होती ? और यह तो प्रत्यक्ष है कि पुरुष से पुरुष, गौ से गौ अथ से अथ इस तरह समस्त जीव जाति अपनी पितृपरंपरा से पैदा होती है । प्रमेह आदि रोग भी पैतृक दिखाई देते हैं । सारांश पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में माता-पिता ही कारण हैं ।
परंपरावादी इतने पक्के नास्तिक थे कि उनका खंडन स्वभाववादी और यहच्छावादी जैसे नास्तिकों ने भी किया है । क्योंकि भारतद्वज ने इस पर यह आपत्ति बतलाई थी