भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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हरिण्याक्ष कुशिक और षड्धातुवाद

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दिगुणों का ही ग्रहण होता है और अप्रतीघातकत्वादिक केवल स्पर्शक्षेय हैं तब आकाशादिकों का शब्दादि तन्मात्राओं में और उनका भी ज्ञान में समन्वय करना उचित है”। किंतु जो संप्रदाय ज्ञातृत्व और कर्तृत्व को भिन्न २ मानते हैं वे इस दलील को स्वीकार नहीं करते।

मालूम होता है कि षड्धातुवादी ‘कृत’कर्म के पक्षपाती थे जैसा कि कर्मवाद के प्रकरण में उद्घुत किये गये अंशों पर से सिद्ध होता है। पुनर्भव विषयक प्रमाणचतुष्टय इनका ही है। हरिण्याक्ष कुशिक, बात-कलाकलीय परिषद् में अनुपस्थित थे।