आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
अग्न्यात्मकं रूपं, दर्शनं, प्रकाशः, पत्तिकौण्यं च । अवात्मकं रसो, रसनं, शैत्यं, मार्दवः, स्नेहः, छेदश्च । पृथिव्यात्मकं गंधो, व्रणं, गौरवं, शैर्यं, मूर्तिश्च । ( च. शा. अ. ४ )
पद्मवृत्तवादिओं के मत से इंद्रिय और इंद्रियार्थ दोनों ही पांचभौतिक होने के कारण उनका उक्त विधान में पंचीकरण किया गया है । इसीका स्पष्टीकरण अन्यत्र इस प्रकार किया गया है कि “ यतोऽभिहितं तत्संभवद्वयसमूहो-भूतादिरुक्तः, भौतिकानि च इंद्रियाण्यायुर्वेदे वक्ष्यंते तथैंद्रियाथाः” ( सु. शा. अ. १ ) अर्थात् जब कि उस कर्मपुरुष को पैदा करने वाला शुक्लशोणितान्तर्गत गुणप्रसादाख्य द्वयसमुदाय पांच-भौतिक है तब आयुर्वेद में इंद्रियों और इंद्रियार्थों को भातिक ही कहा जाता है । और इसी हेतु से यह कहा गया है कि ‘ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तदात्मकमेवार्थमनुगृह्णाति, तत्स्वभावाद्विसुत्वाच्च ’ । ( च. सू. अ. ८ ) अथवा:—
इंद्रियेणेंद्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः । नियतं तुल्ययोनित्वात्मान्येनान्यमिति स्थितिः ।
( सु. शा. अ. १ )
यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जो संप्रदाय, श्रुतत्व में ही कर्तृत्व का समन्वय करते हैं उनकी यह दलील रहती है कि “ चूंकि जब कि इंद्रियों के द्वारा शब्दा-