भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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हिरण्यशक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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कहते । क्योंकि आत्मवादियों की बुद्धि, जिस प्रकार आत्मा से पैदा होकर आगे स्वयं ही अहंकार में तथा आकाशादिकों में परिणत होती है अथवा उनको जनती है उस प्रकार षड्धातुवादियों का सत्त्व, स्वयं गुणग्रहण या गुणोपादान नहीं करता । षड्धातुवादानुसार सत्त्व को इतना स्वतंत्र नहीं माना जाता । इसका मुख्य कारण यह है कि षड्धातुवादी, आत्मा के कर्तृत्व को और ज्ञातृत्व को भिन्न २ मानते हैं । उनके इस मत का निदर्शन “ निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूत गुणद्वियैः ” ( च. सू. अ. १ ) इस विधान पर ले होता है । इसमें सत्त्व गुणों का और भूत गुणों का अलग २ उल्लेख है । सारांश षड्धातुवादानुसार आत्मा का कर्तृत्व, गुणपंचक में व्यक्त होता है और ज्ञातृत्व, करणोपादान रूप त्रिगुणात्मक सत्त्व में । इस तरह यद्यपि आकाशादि गुणपंचक का और सत्त्व का आपस में जन्य जनक संबंध नहीं है तथापि जिस समय चेतनाधातु, गुणग्रहण में प्रवृत्त होता है तब वह करणोपादान संज्ञक सत्त्व से युक्त रहता है ।

रस, शुक्र, आत्मेवादि अन्य गमोत्पादक भावों का भूत पंचक में अतर्भाव करने के हेतु से षड्धातुवादी कहते हैं कि:—मातृजादयोप्यस्य महाभूतविकारा एव । तत्र अस्य आकाशात्मकं शब्दः, श्रोत्रं, लाघवं, सौक्ष्म्यं, विवेकश्च । वाय्वात्मकं स्पर्शः, स्पर्शनं च रौक्ष्यं, प्रेरणं, धातुव्यूहत्वं, चैष्टाश्च शारिरीयः ।