भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आधुनिक-दर्शन

और छिद्र, प्राण आदि गुण विशिष्ट हैं। और इनके द्वारा तत्त्वज्ञान ही समस्त सचेतन अचेतन भूतप्राप्त पैदा हुआ है।”

पृथ्वीवादी, गुणप्रसदाख्य धातुओं का अथवा केवल गुर्बादि स्वभावों का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में समन्वय करते थे। इन गुणों को ही वे आकाश आदि नामों से संबोधित करते थे और अभिव्याक्ति के समय आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादमात्र स्वीकार करते थे।

पृथ्वीवादी, वातपित्तश्लेष्माओं के लोकगत अधिष्ठान पर विचार करते हुए वातपित्तश्लेष्माओं का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में विशेषतः चक्षुत्त्व, उष्णत्व और द्रवत्व में समन्वय करते थे।

पृथ्वीवादानुसार आत्मा ‘गुणी’ है। आकाशादिक अपने मूलभूत अप्रतीघातकत्वादि रूपों में उसके ‘गुण’ हैं। ये गुण ‘अभूत’ नहीं हैं; बल्कि ‘भूत’ हैं। तदनुसार आकाशादिक ‘भूत’ अथवा ‘महाभूत’ कहे जाते हैं। इन महाभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधों की प्रतीति होती है। किंतु ये ‘आत्मगुण’ नहीं हैं; अपितु ‘भौतिक गुण’ हैं। सारांश इनको ‘कार्यगुण’ माना जाता है ‘कारणगुण’ नहीं माना जाता।

पृथ्वीवादी, सत्व को आत्मा का ‘करण’ और ‘उपादान’ कहते हैं। किंतु इसको वे सातवों धातु नहीं

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