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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आधुनिक-दर्शन

और छिद्र, प्राण आदि गुण विशिष्ट हैं। और इनके द्वारा तत्त्वज्ञान ही समस्त सचेतन अचेतन भूतप्राप्त पैदा हुआ है।”

पृथ्वीवादी, गुणप्रसदाख्य धातुओं का अथवा केवल गुर्बादि स्वभावों का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में समन्वय करते थे। इन गुणों को ही वे आकाश आदि नामों से संबोधित करते थे और अभिव्याक्ति के समय आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादमात्र स्वीकार करते थे।

पृथ्वीवादी, वातपित्तश्लेष्माओं के लोकगत अधिष्ठान पर विचार करते हुए वातपित्तश्लेष्माओं का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में विशेषतः चक्षुत्त्व, उष्णत्व और द्रवत्व में समन्वय करते थे।

पृथ्वीवादानुसार आत्मा ‘गुणी’ है। आकाशादिक अपने मूलभूत अप्रतीघातकत्वादि रूपों में उसके ‘गुण’ हैं। ये गुण ‘अभूत’ नहीं हैं; बल्कि ‘भूत’ हैं। तदनुसार आकाशादिक ‘भूत’ अथवा ‘महाभूत’ कहे जाते हैं। इन महाभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधों की प्रतीति होती है। किंतु ये ‘आत्मगुण’ नहीं हैं; अपितु ‘भौतिक गुण’ हैं। सारांश इनको ‘कार्यगुण’ माना जाता है ‘कारणगुण’ नहीं माना जाता।

पृथ्वीवादी, सत्व को आत्मा का ‘करण’ और ‘उपादान’ कहते हैं। किंतु इसको वे सातवों धातु नहीं

हिरण्यशक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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कहते । क्योंकि आत्मवादियों की बुद्धि, जिस प्रकार आत्मा से पैदा होकर आगे स्वयं ही अहंकार में तथा आकाशादिकों में परिणत होती है अथवा उनको जनती है उस प्रकार षड्धातुवादियों का सत्त्व, स्वयं गुणग्रहण या गुणोपादान नहीं करता । षड्धातुवादानुसार सत्त्व को इतना स्वतंत्र नहीं माना जाता । इसका मुख्य कारण यह है कि षड्धातुवादी, आत्मा के कर्तृत्व को और ज्ञातृत्व को भिन्न २ मानते हैं । उनके इस मत का निदर्शन “ निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूत गुणद्वियैः ” ( च. सू. अ. १ ) इस विधान पर ले होता है । इसमें सत्त्व गुणों का और भूत गुणों का अलग २ उल्लेख है । सारांश षड्धातुवादानुसार आत्मा का कर्तृत्व, गुणपंचक में व्यक्त होता है और ज्ञातृत्व, करणोपादान रूप त्रिगुणात्मक सत्त्व में । इस तरह यद्यपि आकाशादि गुणपंचक का और सत्त्व का आपस में जन्य जनक संबंध नहीं है तथापि जिस समय चेतनाधातु, गुणग्रहण में प्रवृत्त होता है तब वह करणोपादान संज्ञक सत्त्व से युक्त रहता है ।

रस, शुक्र, आत्मेवादि अन्य गमोत्पादक भावों का भूत पंचक में अतर्भाव करने के हेतु से षड्धातुवादी कहते हैं कि:—मातृजादयोप्यस्य महाभूतविकारा एव । तत्र अस्य आकाशात्मकं शब्दः, श्रोत्रं, लाघवं, सौक्ष्म्यं, विवेकश्च । वाय्वात्मकं स्पर्शः, स्पर्शनं च रौक्ष्यं, प्रेरणं, धातुव्यूहत्वं, चैष्टाश्च शारिरीयः ।

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आयुर्वेद-दर्शन

अग्न्यात्मकं रूपं, दर्शनं, प्रकाशः, पत्तिकौण्यं च । अवात्मकं रसो, रसनं, शैत्यं, मार्दवः, स्नेहः, छेदश्च । पृथिव्यात्मकं गंधो, व्रणं, गौरवं, शैर्यं, मूर्तिश्च । ( च. शा. अ. ४ )

पद्मवृत्तवादिओं के मत से इंद्रिय और इंद्रियार्थ दोनों ही पांचभौतिक होने के कारण उनका उक्त विधान में पंचीकरण किया गया है । इसीका स्पष्टीकरण अन्यत्र इस प्रकार किया गया है कि “ यतोऽभिहितं तत्संभवद्वयसमूहो-भूतादिरुक्तः, भौतिकानि च इंद्रियाण्यायुर्वेदे वक्ष्यंते तथैंद्रियाथाः” ( सु. शा. अ. १ ) अर्थात् जब कि उस कर्मपुरुष को पैदा करने वाला शुक्लशोणितान्तर्गत गुणप्रसादाख्य द्वयसमुदाय पांच-भौतिक है तब आयुर्वेद में इंद्रियों और इंद्रियार्थों को भातिक ही कहा जाता है । और इसी हेतु से यह कहा गया है कि ‘ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तदात्मकमेवार्थमनुगृह्णाति, तत्स्वभावाद्विसुत्वाच्च ’ । ( च. सू. अ. ८ ) अथवा:—

इंद्रियेणेंद्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः । नियतं तुल्ययोनित्वात्मान्येनान्यमिति स्थितिः ।

( सु. शा. अ. १ )

यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जो संप्रदाय, श्रुतत्व में ही कर्तृत्व का समन्वय करते हैं उनकी यह दलील रहती है कि “ चूंकि जब कि इंद्रियों के द्वारा शब्दा-

हरिण्याक्ष कुशिक और षड्धातुवाद

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दिगुणों का ही ग्रहण होता है और अप्रतीघातकत्वादिक केवल स्पर्शक्षेय हैं तब आकाशादिकों का शब्दादि तन्मात्राओं में और उनका भी ज्ञान में समन्वय करना उचित है”। किंतु जो संप्रदाय ज्ञातृत्व और कर्तृत्व को भिन्न २ मानते हैं वे इस दलील को स्वीकार नहीं करते।

मालूम होता है कि षड्धातुवादी ‘कृत’कर्म के पक्षपाती थे जैसा कि कर्मवाद के प्रकरण में उद्घुत किये गये अंशों पर से सिद्ध होता है। पुनर्भव विषयक प्रमाणचतुष्टय इनका ही है। हरिण्याक्ष कुशिक, बात-कलाकलीय परिषद् में अनुपस्थित थे।

कौशिक का परंपरावाद.

कौशिकः—षड्धातुवाद का खंडन करते हुए कौशिक ने यह कहा कि:—

तदुक्तवन्तं कुशिकमाह तच्चोति कौशिकः ।

कस्मान्मातापितृभ्यां हि विना षड्धातुजो भवेत् ॥

पुरुषः पुरुषाद्वौर्गोश्चादश्चः प्रजायते ।

पिन्ध्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्रकारणम् ॥

अर्थात् केवल षड्धातुसमुदाय से—इनका मिश्रण बना देने से पुरुष की अथवा रोगोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि हो सकती है तो वह बिना माता पिता के ही क्यों नहीं होती ? और यह तो प्रत्यक्ष है कि पुरुष से पुरुष, गौ से गौ अथ से अथ इस तरह समस्त जीव जाति अपनी पितृपरंपरा से पैदा होती है । प्रमेह आदि रोग भी पैतृक दिखाई देते हैं । सारांश पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में माता-पिता ही कारण हैं ।

परंपरावादी इतने पक्के नास्तिक थे कि उनका खंडन स्वभाववादी और यहच्छावादी जैसे नास्तिकों ने भी किया है । क्योंकि भारतद्वज ने इस पर यह आपत्ति बतलाई थी

कौशिकका परंपरावाद

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कि “ यदि च मनुष्यो मनुष्य प्रभवः, कस्मात् जडांधकुञ्ज- मूकवासनमिन्मिण व्यंगोन्मत्तकुण्डिकिलासिन्धो जाताः पितृ- सदृशरूपा न भवति ? ” किंतु भारद्वाज के इस कथन से परंपरावाद पर कुछ प्रकाश नहीं पड़ता। आत्मवादियों ने इतके मत को उद्घृत करते हुए यह कहा है कि “ मातापितृ परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारूष्य रहता है और इस कारण उनको पूर्व सदृश भी कहा जाता है तथापि वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रतिसमय नवीन नवीन होती है। सारांश प्रत्येक प्राणी आत्मतत्त्वरहित पंच- विकारसमुदायमात्र होने के कारण और इस समुदाय का परिणाम ही ‘ सत्त्व ’ होने के कारण चेतना धातुपुरुष, न कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है”। किंतु यह मत भी कौशिक के परंपरावाद से मेल नहीं खाता। कर्मधादियों ने मातापितृ वाद का खंडन करत हुए यह कहा है कि “ इस तरह जिनकी बुद्धि है उनके मत से चतुर्विधा योनि है ही नहीं ! ” अर्थात् पितृ परंपरावादियों का सिद्धांत औद्भिज और स्वेदज योनियों में जिनमें कि मातापितृसंबंध का अभाव है, चरितार्थ नहीं होता। किंतु इस पर से भी कौशिक के परंपरावाद पर पर्याप्त प्रकाश नहीं पड़ता।

आस्तिकों में भी ‘ बुद्धिपूर्वकसर्ग ’ के नाम से एक परंपरावाद प्रचलित है जिसमें ब्रह्मा से मन्वादिकों की,

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आयुर्वेद-दर्शन

मरीच्यादि महर्षियों की और देवासुरमनुष्यों की वंशपरंपरा का विवेचन किया जाता है ।

कौशिक रसपरिषद् में और वातकलाकठीयपरिषद् में उपस्थित नहीं थे ।

भद्रकाप्य का कर्मवाद.

भद्रकाप्यः— कौशिक का प्रतिवाद करते हुए भद्रकाप्य ने कहा कि :—

भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नक्षत्रोऽध्यात्रजायते । मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिं युज्यते ॥

अर्थात् पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में केवल माता-पिता को कारण कहना उचित नहीं है। यदि मातापिता ही कारण हों तो अंधे मातापिताओं से अंधा बालक पैदा होना चाहिये किंतु प्रलक्ष में यह हगोचर नहीं होता। सिवाय कल्प पूर्व अवस्था में जब कि मातापिता का अस्तित्व ही नहीं रहता; आपके कथनानुसार उत्पत्ति असंभव है। वास्तविक बात यह है कि:—

कर्मजस्तु मता जंतुः कर्मजास्तस्य चामयाः । नद्यते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥

पुरुष और रोग कर्म से पैदा होते हैं। बिना कर्म के दोनों की उत्पत्ति नहीं होती।

आगे भारद्वाज ने भद्रकाप्य के कर्मवाद का जिस भाषा में प्रतिवाद किया है उसपर से यह ज्ञात होता है कि

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आयुर्वेद-दर्शन

कुछ संप्रदाय कर्म को 'अकृत' मानते थे तो कुछ 'कृत'। तहाँ भद्रकाण्य, कर्म को 'अकृत' मानने वाले संप्रदायों में से एक हैं। सिवाय भद्रकाण्य के रसपरिषद्ग्रन्थ भाषण पर से यह भी विदित होता है कि भद्रकाण्य का स्मृष्टिविज्ञान प्रकृतिपुरुषवादात्मक होगा। प्रकृति को अनादिस्वतःसिद्ध मानने वाले, 'कर्म' को अकृत मानते भी हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि से कर्म और प्रकृति एक ही पदार्थ है।

चरकसंहिता में अकृत कर्मवाद का इससे अधिक उल्लेख उपलब्ध नहीं होता किंतु कृत कर्मवाद का होता है। चरकसंहिता के त्रिसंक्षिपिणीयाध्यायमें "परलोकैषणा" पर विचार करते हुए यह कहा गया है कि—

अथ तृतीयां परलोकैषणामापद्येत । संशयश्चात्र—कथं भविष्याम इतश्च्युता नवेति, कृतः संशयः पुनः ? इति उच्यते ! संतिष्ठेके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्य माश्रिताः संति च आगम प्रत्यादेव पुनर्भव भिच्छन्ति, श्रुति भेदाश्च ।

मातरं पितरं चैके मन्यते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदच्छांचापरेजनाः ॥

इत्यतः संशयः किंनु खल्वस्ति पुनर्भवो नवेति ?

तत्र बुद्धिमान् नास्तिक्य बुद्धिं ज्ञाता विचिकित्सां च । कस्मात् प्रत्यक्षं हि अल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति, यदागमा-

भद्रकाव्य का कर्मवाद

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नुमानयुक्तिभिरुपलभ्यते । यैरेवतावादिद्वियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, नान्येव संति चाप्रत्यक्षाणि ॥

सतां च रूपाणामतिसंश्रिष्टार्घादतिविप्ररूपांदावरणात्करणद्वैर्वैल्यान्मनोऽनवस्थात्तात्समानाभिहाराद्भिभभाद्विति सौदम्न्याच्च प्रत्यक्षानुपलब्धिः तस्माद् अपरीक्षितमेतदुच्यते ' प्रत्यक्षमेवास्तितान्यदस्तीति ' । श्रुतयः श्रैता न कारणं युक्ति- विरोधात् ।

आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् । द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ सर्वश्रेत्संचेरन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् । निरंतरं नावयवः कश्चित्स्वस्वस्य चात्मनः ॥ बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवात्मा तथैव ते । येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा ॥ विद्यात्स्वाभाविक् षण्णां धातूनां यत्स्वलक्षणम् । संयोगे च विभागे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ अनादश्वेतनाधातोनैष्यते परनिर्मितिः । पर आत्मा सचेद्वेतुरिष्टोस्तु परनिर्मितिः ॥ न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च । न देवा नृपयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ नास्तिकस्यास्ति नैवात्मा यद्वच्छोपहतात्मनः । पातकेश्वः परं चैतत्पातकं नास्तिक ग्रहः ॥

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आयुर्वेद-दर्शन

तस्मान्मतिं विमुञ्च्यैताममार्गप्रसूतां बुधः । सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम् ॥ इति ॥

द्विविधमेव खलु सर्वं सच्चासच्च, तस्य चतुर्विधा परीक्षा आमोदेशः प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिश्चेति । आमास्तावत्—

रजस्तमोभ्यां निर्धुक्तास्तपोज्ञानबलेन ये । येषां त्रिकालमसलं ज्ञानमव्याहृतं सदा ॥ आसाः शिष्टा विदुद्वास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् । सत्यं वक्ष्यति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ आत्मैन्द्रिय मनोऽर्थाणां सन्निकर्पात्प्रवर्तते । व्यक्ता तदात्मे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ प्रत्यक्षपूर्व त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते । बन्दिनिर्गुहो ध्रुमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ एवं व्यवस्थित्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् । दृष्ट्वा बीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ जलकर्षणं बीजतुं संयोगात्सस्य संभवः । युक्तिः षडधातु संयोगात् गर्भार्णां संभवस्तथा ॥ मध्य मंथन मंथान संयोगाद्गनि संभवः । युक्तिशुक्ता चतुष्पादसंपद्वाधिनिवर्हिणी ॥ बुद्धिः पश्यति या भावान्बहुकारणयोगजान् । युक्तिस्त्रिकाला साज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीक्ष्यते । परीक्ष्यं सदसत्त्वेन तया चास्ति पुनर्भवंः ॥

भद्रकाण्य का कर्मवाद

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तत्र आत्मागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदार्थादविपरीतः परीक्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रहः प्रवृत्तः शास्त्रवादः स चात्मागमः । आत्मागमादुपलभ्यते दानं तपो यज्ञं सत्याहिंसा ब्रह्मचर्याण्यभ्युदयतिः श्रेयसं कराणीति । .

न चानतिवृत्तसत्त्वदोषाणामदोषैरपुनर्भवेो धर्मद्वारे- पूषदिर्यते । धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगतभयरागद्वेषलोक- मोहमानैर्ब्रह्मपरैरागैः कर्मविद्विरनुपहतसत्त्वबुद्धिप्रचारेः पूर्वैः पूर्वतैरैर्मेहर्षिभिर्दिव्यचक्षुर्भिर्दृष्टवोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्थे- देवम् ।

प्रत्यक्षस्य चोपलभ्यते “ मातापित्रो विसहशान्यपत्यानि, तुल्यसंभवानां वर्णस्वराकृतिस्तत्त्वबुद्धिभाग्यविशेषाः, प्रवरा- वरकृत्जन्म, दास्यैश्वर्यम, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इहकृतस्यावाप्तिः, अक्षिश्चितानां च रुदितस्तनपानहासत्रासादीनां च प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः, कर्मसाहस्रे फलविशेषः, मेधा कचित् कचित्कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम् इहागमनमितश्चयुतानां च भूतानाम्, समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ” ।

अतएवानुमीयते यत् स्वकृतसपरिहार्यमविनाशि पौर्ब देहिकं दैवसंज्ञकमानुबंधिकं कर्म, तस्यैतत्फलम्, इत्थान्य- ज्ञविष्यतीति । फलाद् बीजमनुमीयते फलं च बीजात् ।

युक्तिश्चैषा—पञ्चधातुसमुदायाद्भंजनम्, कतृकरणसंप्र- योगात् क्रियाः, कृतस्य करणं नाकृतस्य, नांकुरोत्पत्तिरबीजात्,

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आयुर्वेद-दर्शन

कर्मसदृशं फलं नान्यस्माद्वीजादन्यस्योत्पत्तिरिति युक्तिः । एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपादिष्टे पुनर्भवे धर्मद्वारेणवर्धयित । इत्यादि । ( च. सू. अ. ११ )

इसमें कृत कर्मवादियों ने प्रमाण चतुष्टय के द्वारा कर्म, कर्मफल और पुनर्भव को सिद्ध किया है । पुनर्भव के विषय में निम्न लिखित अंश भी मननीय है । जैसा कि:—

भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुश्रूषैर्मनोजवो देहशुपैति देहात् । कर्मात्मकत्वाच्चतु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥ स सर्वगः सर्वशरीरभूव स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः । स चेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्यशुक्र सातुशयः स एव ॥ रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विवाहश्च षट् च देहे । चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथात्मा च चतुर्षु तेषु ॥ भूतानि मातापितृसंभवानि रजश्च शुक्रं च वर्दति गर्भे । आप्यायते शुक्रमसृक्नुव भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥ भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशति गर्भम् । स बीजधर्मी ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥ रूपाद्विरूपप्रभवः असिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः । भवंति येत्वाकृतिबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्म हेतुः ॥ अतीन्द्रियैस्तैरतिश्रद्धमरूपैरात्माकदाचिन्न वियुक्तरूपः । न कमेणा नैव मनोमतिभ्यां नचाप्यहंकारविकारदोषैः ॥ रजस्तमोभ्यां हि मनोऽनुवर्द्धं ज्ञानाद्विना तत्र हि सर्वं दोषाः ।

भद्रकाप्य का कर्मवाद

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गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्तं मनः सदापं बलवच्च कर्म ॥ धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्ता ततोऽन्यथा शोक्रवशं नयंति । शरीर सत्व प्रभवास्तु दोषास्तयोः रवृत्त्या न भवंति भूयः ॥ रूपस्य सत्वस्य च संततिर्या नोक्तस्तदादिर्महि सोऽस्ति कश्चित् । तयोरव्याधिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥ सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्व गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् । जितेन्द्रियं नानुतपंति रोगास्तत्कालयुक्तं यदिनास्ति देवम् ॥ दैवं पुरा यत्कृतमुच्यते तत् तत्पौरुषं यत्विह कर्म दृष्टम् । प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुर्हि समः स एव ॥ ( च. शा. अ. २ )

इसके अतिरिक्त भी चरकसंहिता में जहाँ तहाँ कर्म पर विचार किया गया है। यहाँ अनेक बातें विचारणीय हैं किंतु विस्तार भय के कारण उनको छोड़ देना ही आवश्यक है।

भद्रकाप्य, वातकलाकलीय परिषद् में उपस्थित नहीं थे। हमारे मत से काप्य और भद्रकाप्य भिन्न २ ऋषि हैं। क्योंकि भद्रकाप्य के स्मृष्टिविज्ञान में शब्दादिगुण प्रधानता वादित्व है।

भारद्वाज का स्वभाववाद.

भारद्वाजः—कर्मवाद का खंडन करते हुए भारद्वाज ने कहा किः—

भारद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्व हि कर्मणः ।

दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात्पुरुषः फलम् ॥

अर्थात् कर्म, ( अकृत कर्म ) पुरुषरोगोत्पादक नहीं हो सकता क्योंकि कर्म के पूर्व उसके कर्ता का अस्तित्व मानना ही होगा । बिना किया हुआ कर्म जिसका फल ' पुरुष ' हो; देखने में नहीं आया ।

भद्रकाण्य, पुरुषोत्पादक कर्म को ' अकृत ' कहते थे । अतः भारद्वाज ने सिर्फ उनके प्रतिवाद के लिये ही यहाँ ' कृत ' कर्मवाद का अवलंब किया है । वास्तव में देखा जाय तो भारद्वाज को वह भी मान्य नहीं है । भारद्वाज, अब स्वमत कहते हैं किः—

भावहेतुः स्वभावस्तु न्याधीनां पुरुषस्य च ।

स्वर द्रव चलोष्णत्वं तैजोऽस्तानां यथैव हि ॥

अर्थात् उत्पत्ति का कारण ' स्वभाव ' है । पुरुष और न्याधियों की उत्पत्ति भी स्वभावतः होती है जैसा कि पृथ्वी

भारद्वाज का स्वभाववाद

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में खरत्व, जल में द्रवत्व, अग्नि में उष्णत्व वायु में चलत्व, और आकाश में अप्रतीघातकत्व स्वभावतः रहता है।

भारद्वाज के इस स्वभाववाद को ही हमने ‘धातुपंचकवाद’ के नाम से संबोधित किया है। भारद्वाज, आयुर्वेद की पंचात्मकलोकपक्षीय शाखा के आद्य प्रवर्तक हैं। किसी समय इतका तंत्र बहुत विस्तृत रूप में विद्यमान था। किंतु उपलब्ध वाङ्मय में दो ही चार अंश ऐसे मिलते हैं जिनको कि निश्चय से भारद्वाजीय कहा जा सकता है। मालूम होता है कि तदुत्तरकालीन पंचात्मकलोकपक्षीयों ने जो कि आकाशदिकों को ‘अभूत’ मानने के बजाय ‘भूत’ मानने लगे थे; इनके विधानों में शाब्दिक परिवर्तन किया। अस्तु.

भारद्वाज, मधुरादि आस्वादों को धातुपंचक में विभाजित करते थे जैसाकि उनके रसपरिषदस्थ “पंच रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजो भौमोदकामेयवायवीयांतरिक्षाः” (च. सू. अ. २६) इस विधान पर से ज्ञात होता है।

गर्भोत्पत्ति विषयक अर्थात् ही पुरुषोत्पत्ति विषयक “गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाय्वमितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठानभूतः” यह विधान भारद्वाज का ही है और तदनुसार “तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पंच महाभूत (भारद्वाज की भाषा में ‘पंचधातु’) विकार समुदायात्मकम्”

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आयुर्वेद-दर्शन

(च. शा. अ. ६) यह विधान भी भारद्वाजीय मालूम होता है। दोनों विधानों में स्वभाववादानुसार ‘चेतनाधिष्ठानभूतम्’ का अर्थ ‘चेतना का अधिष्ठान’ करना चाहिये। क्योंकि स्वभाववादी; चेतनाधालु का स्वतः सिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। वे मन को ही ‘चेतस्’ (‘चेत इत्याहुरेके) अथवा ‘चेतना’ कहते थे। उनकी दृष्टि से इस चेतना, चेतस् या मन का समवायिकारण, स्पर्शनेन्द्रिय होकर स्पर्शनेन्द्रिय का भी समवायिकारण धातुपंचक है। “तत्रैकं स्पर्शनेन्द्रियमिन्द्रियाणांमिन्द्रियव्यापकं चेतःसमवायि; स्पर्शनव्याप्तेव्यापकमपि चेतः” (च. सू. अ. १३) इसमें स्पष्ट ही स्पर्शनेन्द्रिय को ‘चेतःसमवायि’ कहा है। इस तरह स्पर्शनेन्द्रिय को चेतस् का कारण कहना दूसरी भाषा में चेतना, चेतस् या मन का धातुपंचक का स्वभाव कहना ही है। अन्य संप्रदायों के द्वारा ‘चेतस्समवायि’ का वास्तविक अर्थ बदल कर उक्त विधानों को अपनाने का भी यत्न हुआ है पर इस तरह वास्तविक स्थिति को तिरोहित करना उचित नहीं मालूम होता।

तत्कालीन संप्रदायों में से कोई माता-पिता को, कोई आत्मा को, कोई सात्त्व्य को, कोई रस को तो कोई सत्व को पुरुषोत्पादक कहता ही था। उनके प्रतिवाद में भारद्वाज का यह कथन है कि:—

भारद्वाज का स्वभाववाद

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“नेति भारद्वाजः किं कारणं हि न माता न पिता न आत्मा न पानाश्रानसक्ष्यलेहोपयोगो गर्भं जनयति । नच परलोकादेत्य गर्भं सत्त्वमवकामति । यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेतां भूयश्च क्षियः पुमांसश्च पुत्रकामास्ते सर्वे पुत्रजन्मभिर्साधाय भैशुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुः दुहितु वा दुहितुकामाः । नच काचित् क्षियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युः अपत्याकामाश्च परिदेवेरन् । नच आत्मा, आत्मानं जनयति । यदि हि आत्मा आत्मानं जनयेत् जातो वा जनयेद्आत्मानमजातो वा जनयति ? तच्चोभयथाप्ययुक्तम् । न जातो जनयति, सत्त्वात् । नचैव अजातो जनयेत् असत्त्वात् । तरमादुभयथाप्यनुपपत्तिः । तिष्ठतु, अथतावदेतत् यदि अयम्, आत्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् नत्येन इष्टास्वेव कथं योनिषु जनयेत् ? वशिन्म, अप्रतिहतगतिं, कामरूपिणं, तेजोबलजवर्णं सत्त्वसंहननसत्त्वसमुदितम्, अजरम्, अरुजम्, अमरम् एवं विधं हि आत्मा, आत्मानमिच्छन् नित्यतो वा भूयः ? असात्म्यजज्ञायं गर्भो यदि हि सात्म्यजः स्यात् तर्हि सात्म्यसेविनामेव एकांतेन व्यक्तं प्रजाः स्यात् असात्म्यसेविनश्च निखिलेन अनपत्याः स्युः । तच्च उभयमुभयत्रैवद्वश्यते । अरसजज्ञायं गर्भः, यदि हि रसजः स्यात् न केचित् स्त्रीपुरुषेषु अनपत्याः स्युः । नहि कश्चिदस्ति एषां यो रसात्रोपयुक्ते । श्रेष्ठरसोपभोगिनां चेत् गर्भो जायते इत्यतोऽभिप्रेताभिति । एवं सति आजौरप्रमार्गमायुरगोक्षीरकृषिमधुयुततैलैर्षधवेक्ष्णुरसमुद्ग्नशालिप्रभृतानामेव एकांतेन प्रजाः

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अयुर्वेद-दर्शन

स्यात्; इयामाकवरकोहालककारदूषकंद्मूलभक्ष्याश्च निखिलेन अनपत्याः स्युः । तच्च उभयमुभयत्रैव दृश्यते । न खल्वपि परलोकोदेय सत्त्वं गर्भमवक्रामति । यदि एनम् अवक्रामेतु न अस्य किञ्चित्तेव पौर्वेदद्विकम्, स्यात् अवदित-मश्रुतमदृष्टं वा । स च किञ्चिदपि न स्मरति । तस्मात् ब्रूमहे “अमातृजश्रयं गर्भः अपितृजश्र, अनात्मजश्र, असात्म्यजश्र, असजश्र न च अस्ति सत्त्वमौपपादिकम्” इति होवाच भारद्वाजः ।

यदि अयम् एषां नानाविधानां गर्भकराणामेव भावानां समुदायात् अभिनिर्वर्तते गर्भः, कथमयं संधीयते ? यदि चापि संधीयते, कस्मात्समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्य विग्रहेण जायते ? मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते; तत्रचेत् इष्टमेतत् यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवः तस्मादेव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा गौः गोप्रभवः यथा च अश्वो अश्वप्रभव इति' एवं सति यदुक्तमग्ने 'समुदायात्मक इति' तत् अयुक्तम् । यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः, कस्मात् जडांधकुञ्जमूकवामनमिम्मिण न्यगोन्मत्तकुष्ठकिलासिभ्यो जाताः पितृसहस्ररूपा न भवति ? अथ तत्रापि बुद्धेरैवं स्यात् 'स्नेनैवायमात्मा, चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान्, घ्राणेन गंधान्, रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान्, बुद्धया बोद्धव्यम् इति' 'अनेन हेतुना न जडादिभ्यो जाताः पितृसहसा भवति' अत्रापि प्रतिज्ञा हानि-

भारद्वाज का स्वभाववाद

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दोषः स्यात्; एवमुक्ते हि आत्मा, सत्सु इन्द्रियेषु 'ज्ञः' स्यात् असत्सु 'अज्ञः'। यत्र च एतदुभयं संभवति ज्ञत्वम् अज्ञत्वं च सविचारआत्मा निर्विकारोज्ञश्च ? यदि च दर्शनादिभिरात्मा विषयान्वेत्ति; निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहात् अज्ञः स्यात्, अज्ञत्वात् अकारणम्, अकारणत्वाच्च 'न आत्मा' इति। चागवस्तुमात्रमेतत् (आत्मजः पुरुष इति) वचनमनर्थकं स्यात् इति हो वाच भारद्वाजः।" (च. शा. अ. ३)

भारद्वाज की इन दलीलों का पुनर्वसु आत्रेय ने बहुत ही विस्तृत और निरपवाद उत्तर दिया है जिसको कि हम आगे अन्तिम निर्णय के समय उद्धृत करेंगे। प्रस्तुत में भारद्वाज के आत्मविषयक तथा सत्त्वविषयक मंतव्यों पर ही प्रकाश डालने का हमारा उद्देश है और वह उनके उक्त विधानों पर से सफल होता है। इन विधानों पर से स्पष्ट होजाता है कि भारद्वाज के स्वभाववाद में आत्मा और सत्त्व दोनों का स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार ही नहीं किया जाता।

निम्न लिखित दो पंचाकरण भी मूल में भारद्वाजीय होंगे किंतु इनमें अन्य संप्रदायों ने कुछ परिवर्तन किया हुआ मालूम होता है। ऐसा कि:-

“सर्वद्रव्यं पांचभौतिकम् (पंचधातुकम् इति भारद्वाजीये) अस्मिन्नेवार्ये तत् चेतनावत् अचेतनं च। तस्य गुणाः