आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
(च. शा. अ. ६) यह विधान भी भारद्वाजीय मालूम होता है। दोनों विधानों में स्वभाववादानुसार ‘चेतनाधिष्ठानभूतम्’ का अर्थ ‘चेतना का अधिष्ठान’ करना चाहिये। क्योंकि स्वभाववादी; चेतनाधालु का स्वतः सिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। वे मन को ही ‘चेतस्’ (‘चेत इत्याहुरेके) अथवा ‘चेतना’ कहते थे। उनकी दृष्टि से इस चेतना, चेतस् या मन का समवायिकारण, स्पर्शनेन्द्रिय होकर स्पर्शनेन्द्रिय का भी समवायिकारण धातुपंचक है। “तत्रैकं स्पर्शनेन्द्रियमिन्द्रियाणांमिन्द्रियव्यापकं चेतःसमवायि; स्पर्शनव्याप्तेव्यापकमपि चेतः” (च. सू. अ. १३) इसमें स्पष्ट ही स्पर्शनेन्द्रिय को ‘चेतःसमवायि’ कहा है। इस तरह स्पर्शनेन्द्रिय को चेतस् का कारण कहना दूसरी भाषा में चेतना, चेतस् या मन का धातुपंचक का स्वभाव कहना ही है। अन्य संप्रदायों के द्वारा ‘चेतस्समवायि’ का वास्तविक अर्थ बदल कर उक्त विधानों को अपनाने का भी यत्न हुआ है पर इस तरह वास्तविक स्थिति को तिरोहित करना उचित नहीं मालूम होता।
तत्कालीन संप्रदायों में से कोई माता-पिता को, कोई आत्मा को, कोई सात्त्व्य को, कोई रस को तो कोई सत्व को पुरुषोत्पादक कहता ही था। उनके प्रतिवाद में भारद्वाज का यह कथन है कि:—