भारतकोश
संग्रह पर लौटें

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

११४

आयुर्वेद-दर्शन

(च. शा. अ. ६) यह विधान भी भारद्वाजीय मालूम होता है। दोनों विधानों में स्वभाववादानुसार ‘चेतनाधिष्ठानभूतम्’ का अर्थ ‘चेतना का अधिष्ठान’ करना चाहिये। क्योंकि स्वभाववादी; चेतनाधालु का स्वतः सिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। वे मन को ही ‘चेतस्’ (‘चेत इत्याहुरेके) अथवा ‘चेतना’ कहते थे। उनकी दृष्टि से इस चेतना, चेतस् या मन का समवायिकारण, स्पर्शनेन्द्रिय होकर स्पर्शनेन्द्रिय का भी समवायिकारण धातुपंचक है। “तत्रैकं स्पर्शनेन्द्रियमिन्द्रियाणांमिन्द्रियव्यापकं चेतःसमवायि; स्पर्शनव्याप्तेव्यापकमपि चेतः” (च. सू. अ. १३) इसमें स्पष्ट ही स्पर्शनेन्द्रिय को ‘चेतःसमवायि’ कहा है। इस तरह स्पर्शनेन्द्रिय को चेतस् का कारण कहना दूसरी भाषा में चेतना, चेतस् या मन का धातुपंचक का स्वभाव कहना ही है। अन्य संप्रदायों के द्वारा ‘चेतस्समवायि’ का वास्तविक अर्थ बदल कर उक्त विधानों को अपनाने का भी यत्न हुआ है पर इस तरह वास्तविक स्थिति को तिरोहित करना उचित नहीं मालूम होता।

तत्कालीन संप्रदायों में से कोई माता-पिता को, कोई आत्मा को, कोई सात्त्व्य को, कोई रस को तो कोई सत्व को पुरुषोत्पादक कहता ही था। उनके प्रतिवाद में भारद्वाज का यह कथन है कि:—

भारद्वाज का स्वभाववाद

११५

“नेति भारद्वाजः किं कारणं हि न माता न पिता न आत्मा न पानाश्रानसक्ष्यलेहोपयोगो गर्भं जनयति । नच परलोकादेत्य गर्भं सत्त्वमवकामति । यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेतां भूयश्च क्षियः पुमांसश्च पुत्रकामास्ते सर्वे पुत्रजन्मभिर्साधाय भैशुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुः दुहितु वा दुहितुकामाः । नच काचित् क्षियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युः अपत्याकामाश्च परिदेवेरन् । नच आत्मा, आत्मानं जनयति । यदि हि आत्मा आत्मानं जनयेत् जातो वा जनयेद्आत्मानमजातो वा जनयति ? तच्चोभयथाप्ययुक्तम् । न जातो जनयति, सत्त्वात् । नचैव अजातो जनयेत् असत्त्वात् । तरमादुभयथाप्यनुपपत्तिः । तिष्ठतु, अथतावदेतत् यदि अयम्, आत्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् नत्येन इष्टास्वेव कथं योनिषु जनयेत् ? वशिन्म, अप्रतिहतगतिं, कामरूपिणं, तेजोबलजवर्णं सत्त्वसंहननसत्त्वसमुदितम्, अजरम्, अरुजम्, अमरम् एवं विधं हि आत्मा, आत्मानमिच्छन् नित्यतो वा भूयः ? असात्म्यजज्ञायं गर्भो यदि हि सात्म्यजः स्यात् तर्हि सात्म्यसेविनामेव एकांतेन व्यक्तं प्रजाः स्यात् असात्म्यसेविनश्च निखिलेन अनपत्याः स्युः । तच्च उभयमुभयत्रैवद्वश्यते । अरसजज्ञायं गर्भः, यदि हि रसजः स्यात् न केचित् स्त्रीपुरुषेषु अनपत्याः स्युः । नहि कश्चिदस्ति एषां यो रसात्रोपयुक्ते । श्रेष्ठरसोपभोगिनां चेत् गर्भो जायते इत्यतोऽभिप्रेताभिति । एवं सति आजौरप्रमार्गमायुरगोक्षीरकृषिमधुयुततैलैर्षधवेक्ष्णुरसमुद्ग्नशालिप्रभृतानामेव एकांतेन प्रजाः

११६

अयुर्वेद-दर्शन

स्यात्; इयामाकवरकोहालककारदूषकंद्मूलभक्ष्याश्च निखिलेन अनपत्याः स्युः । तच्च उभयमुभयत्रैव दृश्यते । न खल्वपि परलोकोदेय सत्त्वं गर्भमवक्रामति । यदि एनम् अवक्रामेतु न अस्य किञ्चित्तेव पौर्वेदद्विकम्, स्यात् अवदित-मश्रुतमदृष्टं वा । स च किञ्चिदपि न स्मरति । तस्मात् ब्रूमहे “अमातृजश्रयं गर्भः अपितृजश्र, अनात्मजश्र, असात्म्यजश्र, असजश्र न च अस्ति सत्त्वमौपपादिकम्” इति होवाच भारद्वाजः ।

यदि अयम् एषां नानाविधानां गर्भकराणामेव भावानां समुदायात् अभिनिर्वर्तते गर्भः, कथमयं संधीयते ? यदि चापि संधीयते, कस्मात्समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्य विग्रहेण जायते ? मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते; तत्रचेत् इष्टमेतत् यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवः तस्मादेव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा गौः गोप्रभवः यथा च अश्वो अश्वप्रभव इति' एवं सति यदुक्तमग्ने 'समुदायात्मक इति' तत् अयुक्तम् । यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः, कस्मात् जडांधकुञ्जमूकवामनमिम्मिण न्यगोन्मत्तकुष्ठकिलासिभ्यो जाताः पितृसहस्ररूपा न भवति ? अथ तत्रापि बुद्धेरैवं स्यात् 'स्नेनैवायमात्मा, चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान्, घ्राणेन गंधान्, रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान्, बुद्धया बोद्धव्यम् इति' 'अनेन हेतुना न जडादिभ्यो जाताः पितृसहसा भवति' अत्रापि प्रतिज्ञा हानि-

भारद्वाज का स्वभाववाद

११७

दोषः स्यात्; एवमुक्ते हि आत्मा, सत्सु इन्द्रियेषु 'ज्ञः' स्यात् असत्सु 'अज्ञः'। यत्र च एतदुभयं संभवति ज्ञत्वम् अज्ञत्वं च सविचारआत्मा निर्विकारोज्ञश्च ? यदि च दर्शनादिभिरात्मा विषयान्वेत्ति; निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहात् अज्ञः स्यात्, अज्ञत्वात् अकारणम्, अकारणत्वाच्च 'न आत्मा' इति। चागवस्तुमात्रमेतत् (आत्मजः पुरुष इति) वचनमनर्थकं स्यात् इति हो वाच भारद्वाजः।" (च. शा. अ. ३)

भारद्वाज की इन दलीलों का पुनर्वसु आत्रेय ने बहुत ही विस्तृत और निरपवाद उत्तर दिया है जिसको कि हम आगे अन्तिम निर्णय के समय उद्धृत करेंगे। प्रस्तुत में भारद्वाज के आत्मविषयक तथा सत्त्वविषयक मंतव्यों पर ही प्रकाश डालने का हमारा उद्देश है और वह उनके उक्त विधानों पर से सफल होता है। इन विधानों पर से स्पष्ट होजाता है कि भारद्वाज के स्वभाववाद में आत्मा और सत्त्व दोनों का स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार ही नहीं किया जाता।

निम्न लिखित दो पंचाकरण भी मूल में भारद्वाजीय होंगे किंतु इनमें अन्य संप्रदायों ने कुछ परिवर्तन किया हुआ मालूम होता है। ऐसा कि:-

“सर्वद्रव्यं पांचभौतिकम् (पंचधातुकम् इति भारद्वाजीये) अस्मिन्नेवार्ये तत् चेतनावत् अचेतनं च। तस्य गुणाः

११८

आयुर्वेद-दर्शन

शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवांताः । कर्म पंचविध मुक्तम् । तत्र द्रव्याणिः—गुरुखरकठिनमंदस्थिरविषदोषाद्रथूलगंधगुण- बहुलानि पार्थिवानि; तान्युपचय संघात गौरव स्नेयै कराणि । द्रव स्निग्धशीतमंदमृदुपिच्छलसरसगुणबहुला- न्याण्यानि; तान्युत्केलदस्नेहबंधनविष्यंदमार्दवप्रल्हादकराणि । उष्णतीक्ष्णलघुसूक्ष्मरूक्षविषद्रूपगुणबहुलान्याग्नेयानि; तानि द्राहपाकप्रभाप्रकाशवर्णकराणि । लघुशीतरूक्षविषदसूक्ष्मस्पर्श गुणबहुलानि वायव्यानि; तानि रौक्ष्यलानिविचारवैषद्यलाघव कराणि । मृदुलघुसूक्ष्मरूक्षगुणशब्दगुण बहुलान्याकाशात्मकानि; तानि मार्दवसौपीर्यलाघव कराणि ।” (च.शा.अ.२६) औरः—

“तत्र यद् विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरुखर- कठिनसंगं नखास्थितं तवेष्टमांसचर्मचैः; केशश्चमश्रुकंडरादि तत् पार्थिवं गंधो घ्राणं च । यद् द्रवसरमंदस्निग्धमृदुपिच्छल- सरसुरविषसाकफपित्तमूत्रस्वेदादि तत् आप्यं रसो रसनं च । यत् पित्तमूत्रमा यो याच भाः क्षीरैरे तत्सर्वं आग्नेयं रूपं दर्शनं च । यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेषनिमेषाकुंचनप्रसरणगमनप्रेरणधारणादि (भारद्वाज मते बुद्धिमन्तश्च) तद् वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च । यत् विविक्तमुच्यते महातिचाणूनि स्रोतांसि तदांतरिक्षं च ।” (च. शा. अ. ७)

उक्त दोनों विधानों में आकाशादिकों को मूलभूत मानकर समस्त अचेतन व सचेतन द्रव्यों को उनमें विभाजित

भारद्वाज का स्वभाववाद

११९

किया गया है। यह विभाजन जिन गुर्वादि विंशति गुणों और शब्दादि गुणों के आधार पर किया है वे भारद्वाज की दृष्टि में ‘कार्यगुण’ हैं; ‘कारणगुण’ नहीं। इसमें जिस ‘रस’ को जल का गुण बतलाया है वंह भारद्वाज की दृष्टि में जिन्हा वैषयिक है पर उनका यह कथन है कि चूँकि जब कि व्रः आस्वादों में इसके साथ अन्य पृथिव्यादि धातुओं का भी अस्तित्व अनिवार्य है तब आस्वाद, पंचधातु मूलक ही हैं।

दोनों पंचीकरणों में ‘वायु’ धातु का जिस कदर विवेचन किया है उसपर से यह सिद्ध होता है कि भारद्वाज को चेतस् या चेतनाधातु के स्वतः सिद्ध अस्तित्व की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। चूँकि जब कि इस अंश को अन्य पंचात्मक लोकपक्षीयों ने भी जैसा का तैसा रक्खा है तब यह सिद्ध है कि वे इसका अर्थ ‘करणवृत्ति’ से अधिक नहीं करते थे और अपने भाव को स्पष्ट करने के हेतु से ही उक्त दूसरे पंचीकरण के अंत में “यत्प्रयोक्तु तत्प्रधानं बुद्धिमेनश्च” इतना अंश अधिक जोड़ दिया।

जैसा कि पहिले कहा गया है; उक्त पंचीकरणों पर से भी सिद्ध होता है कि धातुपंचकवादी, सिद्धांत पक्ष में ‘मल्ल’ संज्ञक अथवा ओज, तेज, धातुमसाद संज्ञक द्रव्यों का पंचीकरण करके सिर्फ शरीरगत वायु, अग्नि और उदक

१२०

आयुर्वेद-दर्शन

को वातपित्तश्लेष्मा कहना चाहते हैं। भारद्वाज, द्रव्य-प्रधानतावादी हैं। उनकी दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा भी द्रव्य ही हैं।

भारद्वाज, यद्यपि गुण वर्ग में गुर्वादि, शब्दादि, परादि सभी का अंतर्भाव करते हैं तथापि उनको गुर्वादि गुणों का ही प्राधान्यत्व मान्य है; इतना ही नहीं तो गुर्वादि गुण प्रधानता वाद के आद्य प्रवर्तक ही भारद्वाज हैं। भारद्वाज ने ही सर्व प्रथम आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि लक्षण घोषित किया। प्रायः इसी हेतु से स्वभाववाद का समर्थन करते हुए भारद्वाज ने पृथिव्यादिकों के स्वर द्रवादि लक्षणों का ही उल्लेख किया है; शब्दादिकों का नहीं। और वातकला-कलीय परिषद् में भी जो कि अग्नीषोमलोकपक्षियों की थी; भारद्वाज सिर्फ गुर्वादि गुणों के आधार पर 'समानगुणाभ्यासो हि धातूनां वृद्धिकारणम्' यह प्रतिपादन करने के लिये ही उपस्थित हुए थे।

कांकायन का प्रजापतिवाद।

वाल्हीकभिषक् कांकायनः—स्वभाववाद का खंडन करते हुएः—

कांकायनस्तु नेत्याह नह्यारंभ फलं भवेत् । भवेत् स्वभावाद्वावानामसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥

कांकायन ने कहा कि पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में स्वभाव को कारण कहना उचित नहीं है। समस्त भावों की सिद्धि अथवा असिद्धि यदि स्वभावतः हो, तो कर्म और फल (जिनका अस्तित्व प्रत्यक्ष सिद्ध है) संबंधी समस्याएँ हल न होंगी।

कांकायन, 'कृत' कर्मवादी थे। उनका कहना था कि किसी भी रूप में विना कर्ता के कर्म पैदा नहीं हो सकता। उसी तरह कर्मफल को भोगनेवाला भी होना चाहिये। कांकायन, अब स्वमत कहते हैं किः—

स्रष्टात्वभित संकल्पो ब्रह्मोपत्यं प्रजापतिः । चेतनाचेतनस्यास्य जगतः मुख दुःखयोः ॥

अर्थात् ब्रह्म का अपत्य प्रजापति ही जो कि अभित संकल्पकारी है; इस सचेतन और अचेतन जगत् को तथा उसके मुख दुःखों को पैदा करता है।

१२२

आयुर्वेद-दर्शन

यह जान लेने पर कि कांकायन, बल्हीक देश के भिषक् थे और उनका प्रजापतिवाद, विशुद्ध वैदिक ( ब्राह्मण ग्रंथों व उपनिषदों की स्मृति के पूर्व का अथवा केवल मंत्रों के आधार पर प्रतिपादित ) संप्रदाय है; ऐतिहासिक दृष्टि से यज्ञःपुरुषीयपरिषद् के काल निर्णय में एक साधन उपलब्ध हो जाता है अस्तु ।

कांकायन का प्रजापतिवाद, जिस वैदिक मंत्र के आधार पर है वह निम्न लिखित है:—

यस्माच्च जातःपरोऽअन्यो अस्ति, य आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया सर्द-रराण स्त्रीणि ज्योतीर्द-षि सचेत सपोदशी ॥ ( यजुर्वेद अ. ८ मंत्र १६ )

अर्थात् जिससे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, जो समस्त भुवनों में अंतर््यामी रूप से प्रविष्ट है, जो प्रजा ( सचेतन-स्मृतिगत जीवात्मा ) के रूप में रमा हुआ है और जो षोडष-कलात्मक अर्थात् पूर्ण है वह प्रजापति, अपनी तीन ज्योतियों को व्यक्त करता है ।

यह श्रुति, प्रजापति दैवत्या है अर्थात् इस में प्रजापति का वर्णन है । कांकायन, इस प्रजापति को 'ब्रह्म' का अपत्य कहते हैं । यहां ब्रह्म, प्रजापति, उसकी तीन ज्योतियाँ और उसकी प्रजा इन पर थोड़ा अधिक विचार करना होगा ।

कांकायन का प्रजापतिवाद

१२३

क्योंकि इन शब्दों में वह सृष्टिविज्ञान है जिसको कि हम प्रजापतिवाद कहते हैं। वास्तव में देखा जाय तो 'पुरुषसूक्त' में जिस विशुद्ध वैदिक सृष्टिविज्ञान का विवेचन है उसी विज्ञान का उक्त प्रजापति देवत्या श्रुति में भिन्न संज्ञाओं में उल्लेख किया है।

यहां 'ब्रह्म' शब्द से पुरुषसूक्त प्रतिपादित उस अनादि पुरुष को संबोधित किया गया है जिसका त्रिपाद अर्थात् ब्रह्महंश, 'अमृतत्व' (निर्विकार) रूप होकर एकपाद अर्थात् स्वल्पांश साशन (सचेतन) अनशन (अचेतन) रूप 'विराट' में परिणत है। [ पु. सू. में १-४ ]

पुरुषसूक्त की भाषा में उक्त एकपाद 'विराट' के अभिमानी पुरुष को 'विराटपुरुष' कहते हैं। किंतु प्रजापतिवाद की भाषा में उसी को 'प्रजापति' कहते हैं। यह, ब्रह्म का ही अंश होने के कारण कांकायन ने उसको ब्रह्म का अपत्य कहा है।

पुरुषसूक्त में यह कहा गया है कि अचेतन सचेतन विराट को पैदा करने के पूर्व विराटपुरुष, प्रधान धर्मों में ('अत्यरिच्यत' में, ५) अलग २ परिणत हुआ। इन धर्मों को पुरुषसूक्त में 'देव' भी कहते हैं। इन देवों के विषय में यह भी कहा गया है कि "यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि

१२४

आयुर्वेद-दर्शन

धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेह नाकं महिमानः संचत यत्र पूर्व साध्याः सति देवाः” । ( पु. सू. मं. १६ ) अर्थात् प्रजापति के ‘ प्राण ’ रूप देवों ने परस्पर के संगतिकरणदानरूप व्यापार के द्वारा यज्ञपुरुष की पूजा की अर्थात् अचेतन-सचेतन बिराट् पैदा किया । ये देव, जोकि वास्तव में ‘ धर्म ’ हैं; सर्व प्रथम पैदा हुए । सृष्टिरूपयज्ञ के विधायक उक्त प्राथमिक धर्म, सृष्ट्युत्पत्ति के पूर्व उस ‘ अमृतत्व ’ रूप त्रिपाद स्वर्ग में अनादि चतुष्पाद पुरुष की ‘ महिमा ’ होकर रहते थे जहां कि पुरा कल्प क भी साधक धर्म रहते आये हैं ।

प्रजापति दैवत्या श्रुति में इन धर्मों को ‘ व्योति ’ शब्द से संबोधित किया है और यह स्पष्ट किया है कि उक्त धर्म ‘ तीन ’ हैं । सारांश प्रजापति, सर्व प्रथम प्राण संज्ञक तीन प्रधान धर्मों म परिणत होता है ।

इन धर्मों के विषय में भिन्न २ मत भी दिखाई देते हैं । उदा० ‘ यस्मान्न जातः ’ यह मंत्र आयुर्वेद में दो जगह आया है । तहां ८ वें अध्याय में भाष्यकार ने अग्नि, वायु और सूर्य इनका उल्लेख किया है और ३२ वें अध्याय में रवि, इंद्र और अग्नि का । किंतु आयुर्वेद में क्रमशः वायु, अग्नि, सोम इन्हीं को स्वीकार किया है । आयुर्वेद में इनको प्राण शब्द से भी संबोधित करते हैं ।

कांकायन का प्रजापतिवाद

१२५

यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रजापति, जिस तरह वायु, अग्नि, सोम संज्ञक धर्मों में अतिरिक्त हुआ उस तरह वह असंख्य प्रजा (पशुपुरुष, मूर्ति, भूतात्मा अथवा जीवात्मा) ओं में भी अतिरिक्त हुआ। धर्मों का आपस में यज्ञ होकर 'भूमि' अर्थात् सप्त आवरण, (सत्य, तप, जन, मह, स्वर, भुव, भू) आकाशादि धातु, सूर्यादि लोक, ऋतु इ० अचेतन सृष्टि पैदा हुई। और तत्पश्चात् शरीर (पुरः) अर्थात् सचेतन सृष्टि पैदा हुई। सचेतन सृष्टि की पैदाइश के समय धर्मों ने यज्ञसाधनभूत 'पुरुषपशु' (जीवात्मा) का 'बहिः' (इसका अर्थ सायणाचार्य ने 'मानस यज्ञ' किया है। किंतु सृष्टिविज्ञान की भाषा में यह उस स्थिति विशेष का बोधक मालूम होता है जिसमें कि अचेतन, सचेतन में परिणत होता है) में प्रोक्षण किया। इस प्रोक्षण के समय वसंत, घी हुआ; ग्रीष्म, समिद हुआ और शरद, हविर्द्रव्य हुआ। इस तरह पशुपुरुष को ७ परिधियों और २१ समिधाओं से बांध दिया गया ! अस्तु। अब वायु, अग्नि, सोम इन प्राथमिक धर्मों के विषय में कुछ अधिक विचार करना आवश्यक है।

वायुः—इसके विषय में निम्न लिखित मंत्र मननीय हैं।

प्राणमाहुर्मातरिश्चानं वातो ह प्राणभुज्यते । प्राणो ह भूतं भज्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

कांकायन का प्रजापातिवाद

१२७

उक्त मंत्रों पर से यह भी ज्ञात होता है कि यह प्राण संज्ञक महती शक्ति ही 'मातरिश्वा' और 'वात' संज्ञक दो प्रकारों में विभक्त है। तहां 'अग्निविसर्जिका' अथवा विसर्जिका शक्ति को मातरिश्वा कहते हैं जैसाकि 'आगे कहा गया है। वात शब्द गत्यर्थक है। भिक्षु आत्रेय, जिस गति को 'काल' शब्द से संबोधित करते हैं वह ही यहां वात शब्द से

१ इस महती शक्ति के विषय में पाश्चात्य वैज्ञानिकों का कथन है कि द्रव्य, शक्ति, संवेदन इस त्रयी में शक्ति से इनऑर्गनिक और ऑर्गनिक सृष्टि अलग २ पैदा होती है। इन आर्गनिक विभाग में प्रथम ईयर, ईयर से विद्युत्परमाणु, विद्युत्परमाणुओं से ८२ मूल द्रव्यों के परमाणु और उनसे सूर्य, पृथ्वी, मिट्टी, पाषाण, क्षार, स्फटिक इत्यादि पैदा होते हैं। आर्गनिक विभाग में प्रथम वह आद्य जीव अथवा आद्य-जीवोत्पादक द्रव्य पैदा हुआ जिससे कि विकास परंपरा के अनुसार समस्त प्राणियों की सृष्टि हुई। यह शक्ति, अविनाशिनी, परिवर्तनशीला और अनेकरूपिणी है। जड़ सृष्टि के कुल चमत्कार इस शक्ति के रूपांतर से ही साध्य हुए हैं। अबतक इसके दो रूप उपलब्ध हुए हैं; 'विसर्जन' और 'प्रेरणा'। प्रत्येक पदार्थ में जो विसर्जन का व्यापार हो रहा है वह इस शक्ति का ही एक प्रकार है। व्यवहार में जिनको उष्णता, (अग्नि) नाद, (वाणी) प्रकाश (तेज) विद्युत् (इंद्र, 'क' इंद्रस्तद्विद्युदिति' शतपथ ब्रा.) और सुंवक्त्व कहते हैं वे गति के क्रमशः कंपन, लहरी, लघुलहरी, तनाव और आवर्त हैं और यह गति भी प्रेरणा का एक प्रकार है। प्रेरणा के कई विशिष्ट प्रकार ऑर्गनिक द्रव्यों में भी रहते हैं।

१२८

आयुर्वेद-दर्शन

अभिप्रेत है। इसके उपलक्ष में ही यह विधान किया है कि यह जब ऋतुओं में परिणत होता है तब सचेतन जगत् पैदा होता है।

प्राण से ही सूर्य व चन्द्र पैदा होते हैं। सूर्य-चन्द्र शब्द अग्नीपोम वाचक भी हैं। अग्नि और सूर्य की उत्पत्ति के विषय में ऋग्वेद में कहा गया है कि “परम आकाश में स्थित वह अग्नि, मातरिश्वा से पैदा हुआ। कुशलता और बल से सिलगे हुए इस अग्नि के तेज से वावापृथिवी प्रकाशमान हुई” (ऋ. १,१४३,२) और अन्यत्र यह भी कहा गया है कि “वायु से अग्नि और अग्नि से सूर्य पैदा हुआ।” (ऐतरेय ब्राह्मण। ८,२०) सोमोत्पत्ति के विषय में यजुर्वेद का “अपांसरस्य यो रसः” (यजु. अ. ९ मं. ३) यह मंत्र मननीय है। इसमें यह कहा गया है कि “उदकों का रस (सार अथवा मूल) सोम है और सोम का भी रस वायु है”। सारांश प्राण अथवा वायु संज्ञक महती शक्ति ही अग्नि व सोम संज्ञक धर्मों में परिणित हुई है।

वार्योविद् ने इस प्राण संज्ञक शक्ति को ही ‘वायु’ शब्द से संबोधित किया है और उसके लोकगत तथा देहगत दोनों कार्यों का विवेचन (इसका मूल अंश हम पहिले त्रिधातु सिद्धांत पर विचार करते हुए उद्धृत कर चुके हैं) किया है। वे कहते हैं कि:—

कांकायन का प्रजापतिवाद

१२१

लोक में संचार करने वाले वायु के स्वाभाविक कार्य थे हैं:- धरणी को धारण करना, ( आकृष्टि ) अग्नि को प्रज्वलित करना, ( मातरिश्वा ) सूर्य, चंद्र, ग्रह गणों को पैदा ( तेजोमेघ से लोकमाला की उत्पत्ति ) करना, व उनके परिभ्रमणगतियों का विधान करना, ( काल ) वर्षाजल को पैदा करना, औद्भिज ( अक्षयओषधयः ) सष्टि को उगाना, ऋतुओं के प्रविभाग करना ( काल ) धातुओं ( आकाशादि द्रव्यों ) के प्रविभाग करना, उनके परिमाण और लक्षणों ( अप्रतीघातकत्व चलत्व उष्णत्वादि ) को व्यक्त करना, बीजों पर अकुरोत्पत्त्यनुकूल संस्कार करना, शस्य की वृद्धि करना, सड़ने न देना, शोषण करना, तथा अविकृत विकारों ( संयुक्त द्रव्यों ) को पैदा करना इत्यादि ।

क्षीरीरगत अकुपित वायु, अवयवों ( यंत्रों ) को और अवयवगत व्यापारों ( तंत्रों ) को धारण करता है । प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान ये उसके ( करणवृत्तिरूप ) प्रकार हैं । यह ऊर्ध्वाधो चेष्टाओं का ( चेष्टावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों अथवा ' वेगों ' Impulses का ) प्रवर्चक है; समस्त ज्ञानकर्मीन्द्रियों का ( अंतःस्थ ) उद्योजक है; इंद्रियार्थों का ( संज्ञावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों द्वारा ) अभिवाहक है तथा मन का ( चित्त की वृत्ति यों का ) उत्पादक ( कथों-कि कथोंविद् सत्त्व तथा चेतना को स्वतःसिद्ध नहीं मानते )

१३०

आयुवेद-दर्शन

व नियामक है। यह शरीरगत समस्त धातुओं में संगठन (बल) करता है; सब संधियों को जोड़ता है और वाणी का प्रवर्तक है। शब्द (नाद लहरी) व स्पर्श (मृदु, कठिन, उष्ण, शीत) की यह प्रकृति (क्यों कि लहरी कंपन इत्यादि गति विशेष, इसी के विकार हैं) है। अतः यह स्पर्शनेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय का मूल है। यह हर्ष (मानसिक प्रसन्नता और पादहर्ष या झुनझुनी सट्टश प्रतिक्रिया भी) और उत्साह (कर्म में प्रवृत्ति) का जनक है। यह, अग्नि (तत्संज्ञक धर्म व अग्निमंडलगत पित्त) को प्रवलयित करता है; दोषों (अन्नरसगत गुणप्रसादात्म्य धातुओं) का (महास्रोत की दीवाल के द्वारा धातुरस में) शोषण करता है और मलों का (शुद्धांत्रस्थ 'मलविवेक' संज्ञक व्यापार के द्वारा) विश्लेषण करता है। यह मोटे व बारीक स्त्रोतों को (गर्भ में) बनाता है और गर्भ की आकृति को पैदा करता है। जीवन व्यापार इसी तंत्र यंत्र धर 'वायु' का परिचय है। ६० ”

वायु के उक्त सब अक्षिपत कार्यो का 'विश्लेष' इस एक ही शब्द में समन्वय किया गया है। क्योंकि अन्यक्त को व्यक्त करना ही उसका प्रधान कार्य है। इस संबंध में वायोवेद का 'भावाभावकर' शब्द भी मननीय है। अस्तु.

अभिः—ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि अभि, 'मातरिश्व' से अर्थात् वायु से पैदा हुआ। और यह भी

कांकायन का प्रजापतिवाद

१३१

विज्ञान सम्मत है कि शक्ति का कोई भी रूपान्तर क्यों न हो उसमें उष्णता पैदा करने की प्रवृत्ति सर्वदा रहती है। इस अग्नि धर्म के चार रूप माने गये हैं। वेदों में इन रूपों के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, हे तेजस्वी नृपते तुम प्रकाश में ( व्यक्तावस्था में ) आने के हेतु आकाश में, (तेजो-सेव, सूर्य, नक्षत्र आदि रूपों में ) उदकों में, ( 'विद्युदग्नि' के रूप में ) पाषाणों और वनों में ( वर्षणजन्य 'अरणाग्नि' के रूप में ) तथा ओषधियों में ( देहाग्नि के रूप में ) प्रगट होते हो। ( ऋ० २-१-१ )

अग्नि की धार्मिकता और सर्वधर्म व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, पहिले की चक्की जिस तरह आरों को वेष्टित करती है उस तरह तुम देवों को वेष्टित करते हो'। ( ऋ० ५-१३-६ ) एक धर्म का दूसरे धर्म में रूपान्तर होने के समय उष्णता का पैदा होना उसकी सर्व धर्म व्यापकता का परिचय है।

सूर्य रूप अग्नि के विषय में यह कहा गया है कि " हे ( सूर्यरूप ) अग्ने, तम ऋतुओं को जानते हो; ( सर्व निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि ) अतः हे ऋतुपते तुम यहाँ (पृथ्वी पर) यज्ञ (अपने 'आदान' धर्म के द्वारा लृष्ट्युत्पादन) करो। ( ऋ० १०-२-१ )

१३२

आयुर्वेद-दर्शन

षड्धातुवादी, अभि को चेतनाधातु का 'गुण' कहते हैं। अभि के विषय में यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।

सोमः—वैदिक सृष्टिविज्ञान के अथवा प्रजापतिवाद के अनुसार सोम की उत्पत्ति वायु से होती है जैसा कि ऊपर 'अपां रसस्य यो रसः' इस श्रुति पर से बतलाया गया है। सोम धर्म के अलग अस्तित्व के विषय में यह कहा गया है कि "हे सोम, तुम्हारा धार्मिक महान स्वरूप दैवीप्यमान है"। "यह महान् शुक्र (सूर्य) और यह सोम (चन्द्र) दोनों ही सोम (धर्म) के पुरोगामी हैं"। (यजु० अ० ८ मं० ४९) सारांश सोम, इनसे भी परे (चौं में) रहता है।

सोम से पैदा होनेवाली सृष्टि के विषय में यह कहा गया है कि "त्वमिमा ओषधीः सोमं विश्वास्त्वमपोऽअजनय-स्त्वंगाः"। (यजु० ३४—२२) अर्थात् हे सोम, तुम ही जलों को, पृथ्वी को, और ओषधियों को (क्रमशः) पैदा करते हो।

जलोत्पत्ति के विषय में यह कहा गया है कि "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो भित्रो अभिः"। (यजु० ७-१४) अर्थात् हे सोम, तुम्हारी विश्वरूपधारिणी वह संस्कृति (जलोत्पादन रूपा) पहिली है जिसमें भित्र, वरुण और अभि तुम्हारे भृत्य थे। रसवाद का विवेचन करते हुए यह

कांकायन का प्रजापतिवाद

१३३

कहा गया है कि वैदिक ऋषि यह भली भांति जानते थे कि सचेतन स्तुति को पैदा करने के लिये आरंभिक जलों की अत्यन्त आवश्यकता है। इन जलों को सोम ( रस ) पैदा करता है अर्थात् सोम, जलों का प्रधान घटक है। किन्तु सोम, अकेला जलों को पैदा नहीं करता तो उसके साथ मित्र, वरुण और अग्नि भी रहते हैं अर्थात् सोम के अतिरिक्त ये भी जलों के घटक हैं।

जलोत्पादन के विषय में अन्यत्र यह कहा गया है कि “मित्रं हुवे पूतदृक्षं वरुणं च ऋषादसम् । धियं घृतार्ची साधता ” ॥ ( यजु० ३३-५७ ) अर्थात् पावित्र्यवर्धक तथा पापक्षयकारक मित्रावरुणों को ( हम ) इस बुद्धि से आवाहन करते हैं कि वे शुद्ध जल का साधन करें। किन्तु यह साधन तबतक नहीं हो सकता जबतक सोम के द्वारा इनको अभिप्रेत न किया जाय। अतः यह कहा गया कि “अयं वा मित्रा वरुणा सुतः सोम ऋतावृधः” ( यजु० ७-९ ) अर्थात् हे यज्ञ वर्धन मित्रावरुण, तुमको सोम ने ‘अभिप्रेत’ किया। मित्र और वरुण के इस अभिषेक के समय अर्थात् ही जलोत्पादन के समय ( अयं वेनश्रोदयत्वृश्रिगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । यजु० ७-१६ ) सोम, विद्युत् से आवृत हो कर झुलेकस्थ ( मित्रावरुणाभिषवरूप ) जलों को पृथ्वी पर प्रेरित करता है।

१३४

आयुर्वेद-दर्शन

सोम की व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि “हे सोम, तुम ध्रुव में, मनुष्यों में, मन में, जल में, वृत्त में, न्योम में, पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्यौ में और स्वर्ग में रहते हो”। (यजु० ९-२) “तुम जहां रहते हो वहां वृद्धि (बल प्रयुक्त विसर्ग) होता है और यज्ञ पूर्ण होता है”। (यजु० ३६-३७) सचेतन सृष्टि को पैदा करना सोम का प्रधान कार्य है। अतः यह कहा गया है कि “सोम, ओषधि और अन्न के लिये संचार करता है”। (यजु० ९-३६)

वैदिक विज्ञान का अभ्यास करने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि यह सोम धर्म, विश्वव्यापी महान् ‘शैत्य’ है। यह तो स्पष्ट ही है कि वैदिक ऋषि इसको आग्ने के सहस्र अलग धर्म मानते थे। किन्तु कुछ समय से विचारियों को यह सिखाया जाता है कि शैत्य, स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि उष्णता का अभाव है! किन्तु इस महाशैत्य के विषय में पश्चात् वैज्ञानिकों के द्वारा अभी २ जो अन्वेषण हुआ है उसपर से वैज्ञानिक जगत् में इतना अवश्य ही स्वीकार कर लिया गया है कि “अणुओं की एक ऐसी स्थिति सम्भव है जिसमें कि अणु, कंपन और स्थलांतरगति रहित एवं निश्चल रहते हैं। यह कंपनविहीन अवस्था शतमान उष्णता के २७३ अंश नीचे रहती है। इस उष्णताविहीन अवस्था का (अर्थात् सोम का) आकाश में निसर्गतः रहना सम्भव है”। इस समय