आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 235 में से
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आयुर्वेद-दर्शन
सोम की व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि “हे सोम, तुम ध्रुव में, मनुष्यों में, मन में, जल में, वृत्त में, न्योम में, पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्यौ में और स्वर्ग में रहते हो”। (यजु० ९-२) “तुम जहां रहते हो वहां वृद्धि (बल प्रयुक्त विसर्ग) होता है और यज्ञ पूर्ण होता है”। (यजु० ३६-३७) सचेतन सृष्टि को पैदा करना सोम का प्रधान कार्य है। अतः यह कहा गया है कि “सोम, ओषधि और अन्न के लिये संचार करता है”। (यजु० ९-३६)
वैदिक विज्ञान का अभ्यास करने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि यह सोम धर्म, विश्वव्यापी महान् ‘शैत्य’ है। यह तो स्पष्ट ही है कि वैदिक ऋषि इसको आग्ने के सहस्र अलग धर्म मानते थे। किन्तु कुछ समय से विचारियों को यह सिखाया जाता है कि शैत्य, स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि उष्णता का अभाव है! किन्तु इस महाशैत्य के विषय में पश्चात् वैज्ञानिकों के द्वारा अभी २ जो अन्वेषण हुआ है उसपर से वैज्ञानिक जगत् में इतना अवश्य ही स्वीकार कर लिया गया है कि “अणुओं की एक ऐसी स्थिति सम्भव है जिसमें कि अणु, कंपन और स्थलांतरगति रहित एवं निश्चल रहते हैं। यह कंपनविहीन अवस्था शतमान उष्णता के २७३ अंश नीचे रहती है। इस उष्णताविहीन अवस्था का (अर्थात् सोम का) आकाश में निसर्गतः रहना सम्भव है”। इस समय