भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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कांकायन का प्रजापतिवाद

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द्रव्याणुओं को शून्यांश उष्णता के नीचे की स्थिति में अर्थात् उष्णताविहीन स्थितिमें रखकर उसके विद्युच्चुंबकत्व आदि धर्मों की स्थिति को जांचने का यत्न हो रहा है। इस जांच पर से अबतक दो बातें निश्चित सी हो गई हैं। पहिली यह कि “किसी द्रव्य को उष्णताविहीन अवस्था में अर्थात् शैत्यावस्था में रक्खा जाय तो उसके अणुओं में ‘संसक्त्याकर्षण’ (Cohesion) और घनता (Density) की वृद्धि होती है”। दूसरी यह कि “उसकी ‘रासायनिक संयोजन शक्ति’ (Chemical Attraction) नष्ट होती है”। सारांश इस महाशैत्य के अर्थात् सोम के स्वतंत्र अस्तित्व पर नव्य वैज्ञानिकों का भी विश्वास धीरे २ बढ़ता जा रहा है। अस्तु।

त्रिधातुसिद्धान्तवादिओं का यह कथन था ही कि “अन्नगत, देहगत, और वंशांकुरगत वातापितक्षेपमा, तत्त्वतः इन वायुअग्निसोमसंज्ञक धर्मों के ही रूपान्तर अथवा विकास हैं। और उनका यह कथन प्रजापतिवाद का पोषक ही है। किन्तु त्रिधातु सिद्धान्तवादी इस बात पर विचार नहीं करते थे कि इन धर्मों का बिना किसी आश्रय के रहना संभव है या नहीं। क्योंकि उनकी दृष्टि से सत्त्व और चेतना दोनों


१ आयुर्वेदांतर्गत ‘बल’ शब्द, संसक्त्याकर्षण और घनता दोनों का वाचक है।