भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

ही इन त्रिधातुओं का अथवा रस का परिणाम होने के कारण वे आत्मा, प्रजापति, ईश्वर इनमें से किसी का भी स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। त्रिधातुवादियों के उक्त शिरो बिहीन सिद्धान्त का वैदिक ऋषि, घोर विरोध करते थे और उनको यज्ञों में निर्मात्र नहीं करते थे। अन्त में जब अश्विनीकुमारों ने प्रजापति का अस्तित्व स्वीकार किया अर्थात् त्रिधातुसिद्धान्त को 'सशिरः' बनाया तब कहीं वे यज्ञों में निर्मात्र किये जाने लगे। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण में भी किया है अर्थात् यह घटना वैदिक काल में हुई है।

प्रजापतिवादानुसार समस्त जगत् की परिणति या व्यक्ति में यद्यपि उक्त धर्मत्रय प्रधान कारण हैं तथापि उनके साथ प्रजापति की अभिन्न कल्पकता का साहचर्य भी आवश्यक है। प्रजापति का यह संकल्प, त्रिधातुओं की सृष्टि नहीं है। वह प्रजापति का 'ज्ञातृत्व' है। वेदों में इसको 'आजानदेव' कहते हैं। वैदिक-सृष्टि-विज्ञान के अनुसार यह संकल्प भी कल्पांत में 'असूतत्व' में उसकी महिमा होकर रहने वाला और कल्प के आदि में वहाँ से व्यक्त होने वाला धर्म है। इसकी व्यक्ति, त्रिधातुओं के पहिले भले ही हुई हो पर इस संकल्प का त्रिधातुओं में परिणत होना प्रजापतिवादियों को सम्मत