आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंकांकायन का प्रजापतिवाद
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नहीं है जिस तरह षड्धातुवादियों की दृष्टि से चेतनाधातु का ज्ञातृत्व, सत्वरूप होकर कर्तृत्व, अप्रतीघातकत्वादि पंचगुण रूप है उस तरह प्रजापतिवादियों की दृष्टि से प्रजापति का ज्ञातृत्व, संकल्प रूप होकर कर्तृत्व त्रिव्योति रूप है। दोनों के मत से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक सम्बन्ध नहीं है किन्तु ‘अन्योन्यानुविधायित्व’ अवश्य है।
यह मालूम नहीं हुआ कि आकाश के विषय में प्रजापति-वादियों का क्या कथन है। अर्थात यह विषय भविष्य में विचारणीय है।
प्रजापतिवाद में गुर्वादि गुणों को प्रधान माना जाता है। क्योंकि कांकायन, वातकलाकलीयपरिषद् में उपस्थित थे और वहाँ उन्होंने ‘प्रकोपन विपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’ इस वक्तव्य के द्वारा गुर्वादिगुणप्रयुक्त प्रकोपनप्रशमन का समर्थन किया है।
कांकायन, रस परिषद् में भी उपस्थित थे। उनका रस विषयक मत उनके “अपरिसंख्येया रसा इति कांकायनो बाल्हीकभिषक् आश्रय गुण कर्म संस्वाद विश्लेषाणामपरि संख्येयत्वात्” इस वक्तव्य पर से व्यक्त होता है।