आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंभिष्म आत्रेय का कालवाद
भिष्म आत्रेयः—कांकायन के प्रति भिष्म आत्रेय ने यह कहा किः—
तन्नेति भिक्षुरात्रेयो न क्षपत्यं प्रजापतिः । प्रजाहिर्तैषी सततं दुःखैर्युज्यादासाधुवत् ॥
अर्थात् प्रजापति को पुरुषरोगोत्पादक कहना अनुचित है । क्योंकि जो प्रजा का हितचिंतक है वह असत् पुरुष की तरह अपने ही अपत्यों को सर्वदा दुःख में नहीं डाल सकता।
उक्त निषेध में उतनी ही रोचकता है जितनी कि सत्वबादी शरलोमा के ‘दुःख द्वेष्टी आत्मा खद को दुःख में नहीं डाल सकता’ इस विधान में है। अस्तु, अब स्वमत कहते हैं किः—
कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः । जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥
अर्थात् पुरुष, काल से ही पैदा होता है, उसके रोग भी काल से पैदा होते हैं, समस्त जगत् कालाधीन होकर काल सर्वत्र कारण है।