आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंकांकायन का प्रजापतिवाद
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लोक में संचार करने वाले वायु के स्वाभाविक कार्य थे हैं:- धरणी को धारण करना, ( आकृष्टि ) अग्नि को प्रज्वलित करना, ( मातरिश्वा ) सूर्य, चंद्र, ग्रह गणों को पैदा ( तेजोमेघ से लोकमाला की उत्पत्ति ) करना, व उनके परिभ्रमणगतियों का विधान करना, ( काल ) वर्षाजल को पैदा करना, औद्भिज ( अक्षयओषधयः ) सष्टि को उगाना, ऋतुओं के प्रविभाग करना ( काल ) धातुओं ( आकाशादि द्रव्यों ) के प्रविभाग करना, उनके परिमाण और लक्षणों ( अप्रतीघातकत्व चलत्व उष्णत्वादि ) को व्यक्त करना, बीजों पर अकुरोत्पत्त्यनुकूल संस्कार करना, शस्य की वृद्धि करना, सड़ने न देना, शोषण करना, तथा अविकृत विकारों ( संयुक्त द्रव्यों ) को पैदा करना इत्यादि ।
क्षीरीरगत अकुपित वायु, अवयवों ( यंत्रों ) को और अवयवगत व्यापारों ( तंत्रों ) को धारण करता है । प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान ये उसके ( करणवृत्तिरूप ) प्रकार हैं । यह ऊर्ध्वाधो चेष्टाओं का ( चेष्टावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों अथवा ' वेगों ' Impulses का ) प्रवर्चक है; समस्त ज्ञानकर्मीन्द्रियों का ( अंतःस्थ ) उद्योजक है; इंद्रियार्थों का ( संज्ञावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों द्वारा ) अभिवाहक है तथा मन का ( चित्त की वृत्ति यों का ) उत्पादक ( कथों-कि कथोंविद् सत्त्व तथा चेतना को स्वतःसिद्ध नहीं मानते )