भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुवेद-दर्शन

व नियामक है। यह शरीरगत समस्त धातुओं में संगठन (बल) करता है; सब संधियों को जोड़ता है और वाणी का प्रवर्तक है। शब्द (नाद लहरी) व स्पर्श (मृदु, कठिन, उष्ण, शीत) की यह प्रकृति (क्यों कि लहरी कंपन इत्यादि गति विशेष, इसी के विकार हैं) है। अतः यह स्पर्शनेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय का मूल है। यह हर्ष (मानसिक प्रसन्नता और पादहर्ष या झुनझुनी सट्टश प्रतिक्रिया भी) और उत्साह (कर्म में प्रवृत्ति) का जनक है। यह, अग्नि (तत्संज्ञक धर्म व अग्निमंडलगत पित्त) को प्रवलयित करता है; दोषों (अन्नरसगत गुणप्रसादात्म्य धातुओं) का (महास्रोत की दीवाल के द्वारा धातुरस में) शोषण करता है और मलों का (शुद्धांत्रस्थ 'मलविवेक' संज्ञक व्यापार के द्वारा) विश्लेषण करता है। यह मोटे व बारीक स्त्रोतों को (गर्भ में) बनाता है और गर्भ की आकृति को पैदा करता है। जीवन व्यापार इसी तंत्र यंत्र धर 'वायु' का परिचय है। ६० ”

वायु के उक्त सब अक्षिपत कार्यो का 'विश्लेष' इस एक ही शब्द में समन्वय किया गया है। क्योंकि अन्यक्त को व्यक्त करना ही उसका प्रधान कार्य है। इस संबंध में वायोवेद का 'भावाभावकर' शब्द भी मननीय है। अस्तु.

अभिः—ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि अभि, 'मातरिश्व' से अर्थात् वायु से पैदा हुआ। और यह भी