भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

कुछ संप्रदाय कर्म को 'अकृत' मानते थे तो कुछ 'कृत'। तहाँ भद्रकाण्य, कर्म को 'अकृत' मानने वाले संप्रदायों में से एक हैं। सिवाय भद्रकाण्य के रसपरिषद्ग्रन्थ भाषण पर से यह भी विदित होता है कि भद्रकाण्य का स्मृष्टिविज्ञान प्रकृतिपुरुषवादात्मक होगा। प्रकृति को अनादिस्वतःसिद्ध मानने वाले, 'कर्म' को अकृत मानते भी हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि से कर्म और प्रकृति एक ही पदार्थ है।

चरकसंहिता में अकृत कर्मवाद का इससे अधिक उल्लेख उपलब्ध नहीं होता किंतु कृत कर्मवाद का होता है। चरकसंहिता के त्रिसंक्षिपिणीयाध्यायमें "परलोकैषणा" पर विचार करते हुए यह कहा गया है कि—

अथ तृतीयां परलोकैषणामापद्येत । संशयश्चात्र—कथं भविष्याम इतश्च्युता नवेति, कृतः संशयः पुनः ? इति उच्यते ! संतिष्ठेके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्य माश्रिताः संति च आगम प्रत्यादेव पुनर्भव भिच्छन्ति, श्रुति भेदाश्च ।

मातरं पितरं चैके मन्यते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदच्छांचापरेजनाः ॥

इत्यतः संशयः किंनु खल्वस्ति पुनर्भवो नवेति ?

तत्र बुद्धिमान् नास्तिक्य बुद्धिं ज्ञाता विचिकित्सां च । कस्मात् प्रत्यक्षं हि अल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति, यदागमा-

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