आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंभद्रकाप्य का कर्मवाद.
भद्रकाप्यः— कौशिक का प्रतिवाद करते हुए भद्रकाप्य ने कहा कि :—
भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नक्षत्रोऽध्यात्रजायते । मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिं युज्यते ॥
अर्थात् पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में केवल माता-पिता को कारण कहना उचित नहीं है। यदि मातापिता ही कारण हों तो अंधे मातापिताओं से अंधा बालक पैदा होना चाहिये किंतु प्रलक्ष में यह हगोचर नहीं होता। सिवाय कल्प पूर्व अवस्था में जब कि मातापिता का अस्तित्व ही नहीं रहता; आपके कथनानुसार उत्पत्ति असंभव है। वास्तविक बात यह है कि:—
कर्मजस्तु मता जंतुः कर्मजास्तस्य चामयाः । नद्यते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥
पुरुष और रोग कर्म से पैदा होते हैं। बिना कर्म के दोनों की उत्पत्ति नहीं होती।
आगे भारद्वाज ने भद्रकाप्य के कर्मवाद का जिस भाषा में प्रतिवाद किया है उसपर से यह ज्ञात होता है कि