भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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जानन्नपि मृदोऽभावात् कुंभकृत्न व्रतर्तते । श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥ इन्द्रियाणि च संक्षिप्य मनःसंक्षिप्य चंचलम् । प्राविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञानं पर्यवस्थितः ॥ सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते । गृष्णीष्व चेदमपरं भरद्वाज विनिर्णयाम् ॥ निवृत्तौद्रियवाक्कृच्छ्रः सुप्तः स्वप्नगतात् यदा । विषयान्मुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यतः स्मृतः ॥ आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते । न द्वेको वर्तते भावो वर्तते नाप्येहतुकः ॥ तस्मात्तु ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च । सर्वमेतत् भरद्वाज निर्णीतं जहि संशयम् ॥ इति.

अर्थात् गर्भोत्पत्ति में उक्त माता पिता आदि भावों का 'समुदाय' कारण है। क्योंकि बिना माता-पिता के गर्भोत्पत्ति नहीं हो सकती; विशेषतः जरायुज प्राणियों का जन्म नहीं हो सकता। गर्भ के कुछ अवयव (त्वचा, लोहित, मांस, भेद, नाभि, हृदय, क्रोम, यकृत, क्रीहा, वृक्कदय, बाल्मि, पुरीषाधान, आमाशय, पक्काशय, उत्तरगुद, अघरगुद, क्षुद्रांत्र, स्थूलान्त्र, वपा और वपाबहन) माता के अंश से पैदा होते हैं और कुछ अवयव (केश, रसश, नख, लोम, दंत, अस्थि, सिरा, स्नायु, धमनी, और शुक्र) पिता के अंश से।