भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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अपने आपको पैदा करता है। उसका एक अवस्था में से दूसरी अवस्था में जाना ही 'जन्म' है चाहे वह भिन्न २ शरीर हों अथवा शरीर की भिन्न २ वयो मर्यादा हों। जिस तरह शुक्ल, शोणित और जीव इनके संयोग के बाद ही गर्भ को गर्भत्व प्राप्त होता है; अन्यथा नहीं होता अथवा जिस तरह संतान पैदा होने के बाद ही पुरुष को पितृ-पद प्राप्त होता है; अन्यथा नहीं होता उसी तरह गर्भात्मा को भी भिन्न २ अवस्थाओं में जातपद और अजातपद प्राप्त होता है।

फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिये कि माता, पिता अथवा आत्मा, गर्भ की सब बातें अपनी इच्छा के अनुसार पैदा नहीं कर सकते। क्योंकि कुछ बातें इनकी इच्छा के अनुसार तो कुछ पूर्वजन्माजित कर्म के अनुसार तो कुछ करणशक्ति के अनुसार होती हैं अथवा नहीं भी होतीं। जहाँ सत्त्व आदि करणों की संपदा रहती है वहाँ संपदा के बल के अनुसार यथेष्टकारित्व रहता है अन्यथा नहीं रहता। किंतु इस पर से यह नहीं कहा जा सकता कि 'यदि करणदोष के कारण गर्भोत्पत्ति नहीं हो सकती तो गर्भोत्पत्ति में आत्मा कारण नहीं है'। क्योंकि आत्माविद् पुरुषों ने यह अनुभव करके देखा है कि दृष्टयोन, ऐश्वर्य और मोक्ष आत्मा के ही आधीन हैं। सुख दुःखों का कर्ता और गर्भोत्पादक, आत्मा के सिवाय कोई नहीं है। जो बढता है वह आत्मा से भिन्न नहीं है अर्थात् बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती।