भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

भित्र २ योनिओं में जन्म, आयुष्य, आत्मज्ञान, मन, इंद्रिय, प्राणापान, प्रेरणा, धारणा, आकार, स्वर, वर्ण, मुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्थिति, अहंकार, व प्रयत्न ये सब आत्मा से प्राप्त होते हैं।

सात्त्व्य, भी गर्भोत्पादक है। सात्त्व्यसेवन के अभाव से स्त्री पुरुष दोनों को बंधत्व आता है; अथवा गर्भ में अनिष्ट बातें पैदा होती हैं। यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जब तक असात्त्व्यसेवी स्त्री-पुरुषों के प्रकृपित बात-पित्तश्लेष्मा, समस्त शरीर में संचार करके शुक्र, आर्तव व गर्भाशय को हानि नहीं पहुंचाते तब तक ही वे ( स्त्री पुरुष ) गर्भोत्पादन में समर्थ रहते हैं। सात्त्व्यसेवी स्त्री-पुरुषों को भी संतति नहीं होती। इसका कारण उनके बीज फल संयोग में ( कर्मवशात् ) आत्मा प्रविष्ट नहीं होता। केवल सात्त्व्य से भी गर्भोत्पत्ति नहीं होती क्योंकि उसमें समुदाय ही कारण है। सात्त्व्य से आरोग्य, अनालस्य आदि भाव पैदा होते हैं।

रस से भी गर्भोत्पत्ति होती है। बिना अन्नरस के माता की जीवन यात्रा तक नहीं हो सकती फिर गर्भ जन्म तो दूर रहा। अयोग्य रीति से रस सेवन किया जाय तो गर्भोत्पत्ति नहीं होती; ना ही केवल सम्यक् रससेवन से ही गर्भोत्पत्ति होती है। सारांश उक्त समुदाय ही कारण है।

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