आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत
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जरा भी प्रवृत्त नहीं हो सकता। और यह तो सिद्धान्त ही है कि कोई भी भाव, ( षड्धातुवादानुसार इन्द्रियजन्यज्ञान और इन्द्रिय अथवा सत्त्व और गुण पंचक ) अकेला नहीं रह सकता और अहेतुक भी नहीं रहता। तस्मात् आत्मा, ज्ञाता भी है, प्रकृति भी है, द्रष्टा भी है और कारण भी है। भारद्वाज, यह सब तय हो चुका है अब संदेह को छोड़ दो।
यह वक्तव्य अनेक दृष्टि से मननीय है। इसमें आत्मा व सत्त्व पर अत्यधिक विचार किया गया है। पुनर्वसु आत्रेय को विश्वास था कि अनात्मवादी, विशेषतः भारद्वाज, आत्मा का स्वतःसिद्ध अस्तित्व और सत्त्व का औपपादुकत्व स्वीकार कर लें तो विवाद का एक बहुत बड़ा अंश हल हो जायगा। यज्ञः पुरुषीय परिषद् में उन्होंने अध्यात्म चिन्तन का उपदेश इसी हेतु से किया।
पुनर्वसु आत्रेय का अध्यात्म चिन्तन विषयक उपदेश जितना अर्थ पूर्ण है उतना ही अर्थ पूर्ण पक्षरागत्याग विषयक उपदेश भी है। यह तो स्पष्ट ही है कि यज्ञः पुरुषीय परिषद् में आत्मा, सत्त्व, और शरीर इस त्रयी में, से एक २ के नितान्त समर्थक सम्प्रदाय भी उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त उनमें आत्मा के ज्ञातृत्व व कर्तृत्व के विषय में, लोकपक्ष के विषय में और गुणों के विषय में भी दल बन्दियों थीं। इन सब दल बन्दियों का अन्त करने के हेतु से पुनर्वसु आत्रेय