भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

ने अपना त्रिभागात्मक सृष्टि विज्ञान अलग ही प्रस्थापित किया था। और उसी को स्वीकार करने के हेतु से उन्होंने पक्षराग-त्याग का उपदेश भी किया। अतः अब उस पर विचार करें।

त्रिभागात्मक सिद्धान्त

पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धान्त का स्वरूप निम्न लिखित है। जैसा कि:—

सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदंडवत् ।

लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

स पुमान् चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।

वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ (च.सू.अ.१)

अर्थात् सत्त्व, आत्मा व शरीर ये तीनों त्रिपाही के सहस्र हैं। इनके संयोग पर सचेतन सृष्टि स्थित है और इसी संयोग पर सब कुछ (अचेतन सृष्टि) अवलंबित है। इस संयोग को ही 'पुरुष,' (समुदायात्मक) 'चेतन' (सचेतन द्रव्य) और 'अधिकरण' (आयु) कहते हैं। इसको जानने (व सुरक्षित रखने) के लिये ही यह 'आयुर्वेद' प्रकाशित हुआ है।

इस सिद्धान्त का बाह्य स्वरूप यद्यपि त्रिभागात्मक है तथापि इसके तात्त्विक स्वरूप में एक मात्र आत्मा ही मूल-

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