आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
प्रायः इसी हेतु से उन्होंने एक तरफ सत्त्व को केवल औषपादुर्क सिद्ध किया तो दूसरी तरफ ( वातकलाकलीय-परिषद् में ) त्रिधातुओंका जगदुत्पादकत्व स्वीकार करते हुए उनके सत्त्वजनकत्व का ‘ सर्व एव भवंतः सन्मग्नाहु-रण्यत्रैकालिकवचनात् ’ इस तरह निषेध भी किया । सत्त्व और शरीर का पृथक् २ उल्लेख करना और धातुप्रकृति व महाप्रकृति के भिन्न २ उत्पादक कारणों का विवेचन करना भी यही अर्थ रखता है कि पुनर्वसु आत्रेय, सत्त्व और शरीर में जन्म जनक संबंध स्वीकार नहीं करते थे ।
त्रिभागात्मक सिद्धांतानुसार त्रिगुण व त्रिधातुओं में यद्यपि जन्मजनक संबंध स्वीकार नहीं किया जाता तथापि उनमें ‘ अन्योऽन्यानुविधायित्व ’ स्वीकार किया ही जाता है । क्योंकि त्रिगुणों के असंख्य प्रकारों पर विचार करते हुए स्पष्ट शब्दों में यह कहा गया है कि “ तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वात्ताम् एकैकस्य च भेदाग्रमपरिसंख्येयम् तरतमयोगात्, शरीरयोनिविशेषेभ्यश्च, अन्योऽन्यानुविधानत्वाच्च शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते सत्त्वं च शरीरम् ” । ( च. शा. अ. ४ ) शरीर, सत्त्व का अनुविधान करता है और सत्त्व, भी शरीर का अनुविधान करता है । सत्त्व और शरीर के
१ सत्त्व को संबंध विधायक कहना पर्याय से त्रिगुणों का शब्द-स्पर्शादि तन्मात्राओं के द्वारा महाभूतजनकत्व अस्वीकार करना ही है ।