भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

१६७

इस ' अन्योऽन्यानुविधायित्व ( सायको फिजिकल् प्यारेल-लिउम Psycho Physical Parallelism के कारण भिन्न २ योनि विशेष, अवयव रचना अथवा इंद्रिय रचना विशेष तथा वय विशेष के अनुसार सत्व के प्रकारों में भी अनेक विशेष पैदा होते हैं। सिवाय शुद्धबहुल, शुद्धबहुलतर और शुद्धबहुलतम इस तरह तरतम भाव से भी सत्व के असंख्य प्रकार होते हैं। इसी तरह सत्व के अनुविधान से शरीर में भी विशेषताएँ पैदा होती हैं। इसी संबंध को लेकर यह भी कहा गया है कि ' निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्वि-शेषः सत्वशरीरयोस्तु विशेषात् विशेषोपलब्धिः '। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् प्राणियों में जो विभिन्नता प्रतीत होती है वह सत्व और शरीर की विविधताओं तथा अन्योऽन्यानु-विधान के कारण होती है। किंतु आत्मा, अपने पर स्वरूप के कारण निर्विकार और एकसाँ रहता है। षड्धातुवादिओं ने यह भी कहा है कि निर्विकार और पर आत्मा, नित्य होकर चैतन्य में कारण है और वह सत्वगुण, भूतगुण तथा इंद्रियों के द्वारा सब व्यापारों को देखता है अर्थात् द्रष्टा है। ( च. सू. अ. १ ) त्रिभागात्मक सिद्धांत के उक्त संबंध को निम्न लिखित सारिणी पर से भी जाना जा सकता है।

जैसा कि:-