आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 235 में से
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कुलकुंडलिनी से लगी हुई इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरी, कुहू, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुषा व गांधारी नाम की नाडियाँ और इन चौदह नाडियों से संबंधित सहस्रों शाखा प्रशाखा इनका उल्लेख है। ( आयुर्वेदांतर्गत भिन्न २ संप्रदायों ने नाडियों को भिन्न २ शब्दों से संबोधित किया है। )
इसके अतिरिक्त छः चक्रों का उल्लेख किया जाता है। जैसा कि ‘‘ गुद से दो अंगुल ऊपर कुंडलिनी में मूलाधार नामक स्थान है । वहां चार दल का ‘आधारचक्र’ है । इसके ऊपर किंतु नाभि के नीचे छः दल का ‘स्वाधिष्ठानचक्र’ है । नाभि और द्रव्य के बीच में दस दल का ‘मणिपूरकचक्र’ है । इसके पास ही जीवात्मा
कुंडल्यधश्चोर्ध्वभागेषु प्राणः संचरति । श्रोत्राक्षिकटिगुल्फप्राणगलस्फिन्दरोषु व्यानः संचरति । गुदमेदोरेजानुदरद्वेषणकटिजंघानाभ्यन्मयगारेष्वापानः संचरति । सर्वसंस्थिस्थ उद्गानः । पादहस्तयोरपि सर्वगत्रेषु सर्वव्यापी समानो भुक्तान्नरसादिकं गग्रेऽग्निना सह व्यापयन् द्विसप्तति सहस्रेषु नाडीं मार्गेषु चरन् समानवायुरग्निना सह सांगोपांगं कलवरं व्याप्नोति । ( शांडिल्योपनिषद् १।४ )
आधारस्तु चतुर्दलोऽरुणसहि वीसान्तवर्णाश्रयः । स्वाधिष्ठानमनेक विष्णुतकरा बालांतपदपत्रकम् ॥ रत्नाभं मणिपूरकं दशदलं ढाचिःफकारान्तकम् । पत्रैर्द्रादशाभिस्त्वनाहतपुरं हैमं कठाराणितम् ॥ १॥ मात्राभिदेलं षोडशस्वरयुतं ज्योतिर्विद्युद्द्राडिजम् । ई क्षं द्रव्यक्षरसंयुतं द्विदलकं रत्नोपमाज्ञापुरम् ॥ तस्माद्दूध्वभघोषमुखं विकसितं पद्मं सहस्राक्षिदम् । नित्यानंदमयं सदाशिवपदं नित्यं नमस्ते सदा ॥२॥ (स्व. सि.)