आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 235 में से
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आयुर्वेद-दर्शन
का निवासस्थान ‘हृदयकमल’ है। हृदय और तालूमूल के बीच में बारह दल का ‘अनाहतचक्र’ है। तालूमूल व ललाट के बीच में सोलह दल का ‘विशुद्धचक्र’ है। ललाट व सीमन्त के बीच में ‘आज्ञाचक्र’ है। इसके ऊपर ब्रह्मरंध्र और ब्रह्मरंध्र के भी ऊपर शिव का निवासस्थान, अधोमुख सहस्रदल कमल है। ये सब बिस-तंतु मार्ग से निबद्ध हैं।” इत्यादि।
उक्त सब रचना धातुप्रसाद की बनी हुई है। प्रत्यक्ष में धातुप्रसाद के दो प्रकार उपलब्ध होते हैं; धूसर व श्वेत। तहां धूसर धातुप्रसाद के बने हुए अवयवों को ‘पद्म’ अथवा ‘कमल’ कहते हैं। ये अनेक प्रकार के और असंख्य हैं। इनका शरीर में सर्वत्र अस्तित्व है। सहस्रदलकमल, हृकमल, कुंडिलिनी आदि भाग मुख्यतः इन पद्मों के संयोग से ही बने हुए हैं। उक्त लघु पद्म, बिसतंतुओं से युक्त हैं। ये बिसतंतु, श्वेत धातुप्रसाद के बने हुए हैं और इनके ही समुदाय से नाडियां बनी हुई हैं। इन तंतुओं अथवा नाडियों के द्वारा समस्त पद्म एक दूसरे के साथ संबद्ध हैं और इस तरह इनका समस्त शरीर में जाल-सा बिछा हुआ है। इस संस्था का पाश्चात्य शारीरवेत्ताओं ने बहुत ही सूक्ष्मता से अन्वेषण किया है। अस्तु.
उक्त रचना में ही कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अतीन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय होने के कारण यह इंद्रिय व्यापक स्पर्शनेन्द्रिय, इनकी सबकी संगठित संस्था है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो उक्त संस्था के द्वारा ही ‘करणवृत्ति’ और ‘चित्तवृत्ति’ संज्ञक व्यापार प्रस्तुत होते हैं। जो संप्रदाय इन वृत्तियों को वायु धर्म कहते हैं वे इन वृत्तियों का प्राणार्दि प्रकारों में भी विभाजन करते हैं।