आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट
१८१
वायोंविद ने वायुधर्म का विवेचन करते हुए कहा है कि यह वायु, प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान इन प्रकारों में विभक्त है। किन्तु उन्होंने अपने विवेचन में इन प्रभेदों का अलग २ कार्य-निर्देश नहीं किया है। अतः उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह एक अनुमान ही होगा।
वायोंविद की दृष्टि में प्राणधर्म का प्रधान कार्य 'उत्साह' अथवा 'उद्योजन' [ सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, हर्षोत्साहयोर्गनिः ] है।
उद्योजन, Irritability धातु प्रसाद में और अन्यत्र भी रहता है। धातुप्रसाद के धूसर भाग में अर्थात् पञ्चों में खासकर उद्योजन रहता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ अवयव ऐसे हैं जिनमें स्वतंत्र रूप से उद्योजन शीलता रहती है। जैसा कि अणु अवयवगत उद्योजन, जिसके द्वारा वह अपने स्वभाविक कार्य करता है; स्नेष्मगत बलोत्पादक उद्योजन; पीतस्त्रावु [ Yellow fibres ] गत और नेच-तृतीयपटलगत आयम्यता का उत्पादक उद्योजन; पक्ष्मापरा [ Ciliated epithelium ] गत पक्ष्म व्यापार ( तृणजलोका गति ) को पैदा करने वाला उद्योजन; रसशोषणक्षमता का उत्पादक रक्तस्थ श्वेतकण गत उद्योजन; अग्निमंडलगत पिचोत्पादक उद्योजन और प्रस्पंदन प्रवर्तक हृन्मांसगत उद्योजन। वायोंविद की भाषा में उक्त सभी उद्योजनों का अंतःस्थ उद्योजक 'प्राणधर्म' ही है। यद्यपि सत्व के तथा बाह्य विषयों के कारण उद्योजनशील अवयव उत्तेजित होते हैं तथापि ये अन्य उद्योजक, प्राणधर्म के अभाव में उत्तेजना पैदा नहीं कर सकते। अतः प्राणधर्म को ही प्रधान उद्योजक कहना उचित है।