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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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वायोंविद ने वायुधर्म का विवेचन करते हुए कहा है कि यह वायु, प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान इन प्रकारों में विभक्त है। किन्तु उन्होंने अपने विवेचन में इन प्रभेदों का अलग २ कार्य-निर्देश नहीं किया है। अतः उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह एक अनुमान ही होगा।

वायोंविद की दृष्टि में प्राणधर्म का प्रधान कार्य 'उत्साह' अथवा 'उद्योजन' [ सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, हर्षोत्साहयोर्गनिः ] है।

उद्योजन, Irritability धातु प्रसाद में और अन्यत्र भी रहता है। धातुप्रसाद के धूसर भाग में अर्थात् पञ्चों में खासकर उद्योजन रहता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ अवयव ऐसे हैं जिनमें स्वतंत्र रूप से उद्योजन शीलता रहती है। जैसा कि अणु अवयवगत उद्योजन, जिसके द्वारा वह अपने स्वभाविक कार्य करता है; स्नेष्मगत बलोत्पादक उद्योजन; पीतस्त्रावु [ Yellow fibres ] गत और नेच-तृतीयपटलगत आयम्यता का उत्पादक उद्योजन; पक्ष्मापरा [ Ciliated epithelium ] गत पक्ष्म व्यापार ( तृणजलोका गति ) को पैदा करने वाला उद्योजन; रसशोषणक्षमता का उत्पादक रक्तस्थ श्वेतकण गत उद्योजन; अग्निमंडलगत पिचोत्पादक उद्योजन और प्रस्पंदन प्रवर्तक हृन्मांसगत उद्योजन। वायोंविद की भाषा में उक्त सभी उद्योजनों का अंतःस्थ उद्योजक 'प्राणधर्म' ही है। यद्यपि सत्व के तथा बाह्य विषयों के कारण उद्योजनशील अवयव उत्तेजित होते हैं तथापि ये अन्य उद्योजक, प्राणधर्म के अभाव में उत्तेजना पैदा नहीं कर सकते। अतः प्राणधर्म को ही प्रधान उद्योजक कहना उचित है।

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सामान्यतः समस्त उद्योजनशील अवयव, प्राणधर्म के निवास स्थान हैं। फिरभी हृत्कमल जैसे मध्यम कमल, कुंडलिनी, और ज्ञानेन्द्रियगत धूसर धातुप्रसाद, में इसके उच्चतर स्थान तथा प्राणायतन Internal Capsule के आस पास और अधिपति के 'दलस्थली' Cortex में उच्चतम स्थान हैं।

प्राण के द्वारा सर्व प्रथम उद्योजन होता है और यह उद्योजन ही अनेक व्यापारों में परिणत होता है। धूसर धातुप्रसाद गत अर्थात् पश्चात्त उस उद्योजन, तंतुओं में 'वेगों' का अथवा 'वृत्तियों' का रूप धारण करता है। ये वेग दो प्रकार के हैं; प्रवर्तक और अभिवाहक। प्रवर्तक वेगों के कारण कर्मेन्द्रियों के द्वारा आकुंचनप्रसरणादि अथवा ग्रहणविसर्जनादि व्यापार होते हैं। और अभिवाहक वेगों के कारण ज्ञानेन्द्रियों द्वारा शब्दस्पर्शादि विषयों का अभिवहन होता है। इसी हेतु से वायोंविद ने प्राणधर्म को अर्थाभिवाहक ( इन्द्रियार्थानामभि वोढा ) और चेष्टाप्रवर्तक ( प्रवर्तकश्चेष्टामुच्चावचानाम् ) कहा है। उक्त दोनों प्रकार के वेग यद्यपि भिन्न २ नाडियों से प्रस्तुत होते हैं तथापि उनका समवायि कारण नाडियां नहीं हैं अथवा अमुक वेग अमुक नाडी से ही प्रस्तुत हो यह नहीं है।

प्राण के व सत्व के निवास स्थान प्रायः एक ही हैं और नाडियों में से प्राणवृत्तियों के साथ २ चित्तवृत्तियाँ भी संचार करती हैं। प्रायः इसी हेतु से वायोंविद् सत्व को प्राण का परिणाम कहते हैं और तदनुसार प्राण को सत्व का उत्पादक व नियामक ( नियंता प्रणेता च मनसः ) कहते हैं। किन्तु यह ध्यान में रखना चाहिये कि सहस्रदल कमल के दलस्थली में विशेषतः उसके पुरोभाग में ऐसे पद्म हैं जिनमें

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किं सत्त्व की दृष्टियाँ प्रधानता से रहती हैं। फिर भी वायोविद्, प्राण को हर्ष (सत्त्वद्वत्प्रादक उद्योजन) की योनि (हर्षोत्साहयौनिः) मानते ही हैं।

प्राण, का यह विवेचन बहुत व्यापक है। प्राण के इस व्यापक क्षेत्र को संकुचित करके ही उदान आदि प्रभेदों की कल्पना की गई है। तदनुसार उदान के तीन कार्य हैं; (१) समस्त शारीर धातुओं का व्यूह करना, (२) अवयवों का सन्धान करना, और (३) वाणी को प्रवृत्त करना। (१) अग्नि को प्रज्वलित करना, (२) शरप्राण का शोषण करना और (३) बाँहमलों को अर्थात् किट्ठको अलग करना ये तीन कार्य समान के बतलाये हैं। वायोविद् के वक्तव्य में व्यान के कार्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। गर्भावस्था में कल्लपाक के समय छोटे बड़े खोटों को बनाना और गर्भ में आकृति पैदा करना अपान का कार्य है।

वायोविद् का यह प्राणादि विवेचन यजःपुराण परिसूद् के समय का है।

इसके अतिरिक्त चरक संहिता के वातव्याधि विकृत्सा में भी प्राणादि प्रकारों का विवेचन उपलब्ध होता है। मालूम नहीं कि यह विवेचन किसने किया और कब किया। वह इस प्रकार है:—

स्थानं प्राणस्य शीघोरः कर्णजिन्नाक्षिनासिकाः । श्वीवनक्ष्वथूद्धारः श्वासाहारादि कर्म च ॥

इसमें समस्त अभिवाहक वेगों का और कुछ प्रवर्तक वेगों का प्राण के कार्य क्षेत्र में समावेश किया गया है। चारम्भ ने भी अपने 'बुद्धिद्वयौद्रीयचित्तयूक्' इस विधान में अभिवाहक वेगों का और

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‘ धीवनक्षत्रशुद्धारिनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ’ इसमें प्रवर्तकवैगों का उल्लेख किया है। यहाँ यह देखना आवश्यक होजाता है कि उस धीवनादि कार्ये जिन नाडियों के द्वारा प्रस्तुत होते हैं उनका किस चक्र से सम्बन्ध है। किन्तु यह अन्वेषण अभी विचाराधीन रखना ही उचित है।

वदानस्य पुनः स्थानं नाम्भुरः कंठ एव च ।

वाक्प्रवृत्तिं प्रयत्नौञो बल वर्णादि कर्म च ॥

इसमें यद्यपि नाभि और उरस का उदान के स्थानों में उल्लेख है तथापि कंठ को ही मुख्य स्थान कहा गया है। कार्यों में वाणी और बल का उल्लेख है। ध्वनि पैदा होने के लिये यद्यपि अवकाश और इवा की आवश्यकता है तथापि स्वरवर्ण विशेष पैदा होने के लिये स्थान, प्रयत्न और वे प्रवर्तक वेग जिनके द्वारा कंठगता स्वरतंत्रियाँ तनतीं व शिथिल होती हैं; प्रधान कारण हैं। बल, ओज में रहता है; अतः ओज का भी उल्लेख है।

उपनिषदों में उदान के उद्गमन का दो जगह उल्लेख है। एक जीवात्मा के पुनर्भव के समय और दूसरा हृदयाकाश स्थित जीवात्मा को मूर्द्ध में शिव के समीप ले जाने के समय। वाग्भट ने उदान को ‘ स्मृतिक्रिय ’ भी कहा है।

स्वेददोषांशुवाहीनि शोतांसि समाधिष्ठितः ।

अंतरग्नेश्च पार्श्वस्थः समानोऽग्निबलप्रदः ॥

यहाँ शोतसु शब्द ‘ पिंड ’ वाचक है। पिंडों की आकृति साधारणतः शोतों के सदृश ही होती है। इसमें पित्तोत्पादक पिंडों को

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अर्थात् अनिमंडलों को 'स्वेदवहसोत;' ऋदककफोत्पादक पिंडों को अर्थात् सोममंडलों को 'अनुवहसोत' और अन्य कतिपय पिंडों को 'दोषवहसोत' कहा गया है। दोषवह सोतों में किनका समावेश करना यह विचारणीय है। फिरभी यह कहा जा सकता है कि उक्त स्वेदांयुवह सोतों के तथा उन पिंडों के जो कि अर्पान के क्षेत्र में हैं; अतिरिक्त ही दोषवहसोत हैं। इन दोषवह सोतों में 'अंतःखावी' पिंडों का भी समावेश किया जा सकता है। दोष शब्द आयुर्वेद में अनेक अर्थों में प्रयुक्त होने के कारण अंतःखावों को भी लगाया जा सकता है।

इन सोतों में विशेषतः तद्रत अणु अवयवों और 'अभिपूतों' में जो स्वेदांयुदोषोत्पादक धर्म हैं वह समान संज्ञक है। यह धर्म उनमें स्वतंत्रता से रहता है तथापि इसका वास्तव्य अंतरनि के बाजू में-स्थित धातुप्रसाद म भी रहता है जिससे कि अनिमंडल गत अभिपूतों को पिचोत्पादन करने की क्रमोवशी शक्ति प्राप्त होती है।

इसमें समान के 'दोषशोषण' और 'विवेचन' के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है। वाग्भट के 'अंत्रणृण्णाति' का अर्थ 'रस शोषण' है।

देहं व्याप्रोति सर्वं तु व्यानः शीघ्रगतिर्नुणाम् ।

गतिप्रसारणाक्षेपनिमेषादि क्रियाः सदा ॥

इसमें व्यान के स्थान व कार्यों का ऐसे शब्दों में वर्णन किया है जो कि रस संवहन और मांस स्नायवीय च्छा दोनों में चरितार्थ हो। रससंवहन का आरंभ हृदय के निमेषोन्मेषण से होता है अतः वाग्भट

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ने इसको सर्वदेहचारी कहते हुए भी हृदय स्थित कहा है। हृदय के निमेषोन्मेषण के कारण रसका विक्षेप (व्यानने रसधातुहिं विक्षेपोन्मेषित कर्माण् ४०) होता है और वह समस्त देह में शीघ्र गति से संचार करता है। उक्त निमेषोन्मेषण रूप व्यापार वाहिनियों में भी रहता है और उससे रस व रक्त का अभिसरण जहां जितना और जिस वेग में आवश्यक हो; होता है। निमेषोन्मेषण कारक यह व्यानघर्म हृन्मांसखायुओं में स्वतंत्र और अन्य खायुओं में धातुप्रसादाधीन रहता है।

मांस स्नायवीय आकुंचन, प्रसरण, आयम्यता, तन्यता आदि चेष्टाओं के प्रवर्तक नाडी वेगों को व्यान कहने की प्रवृत्ति इसमें पाई जाती है पर व्यान के इस क्षेत्र का निर्णय प्राणादि अन्य प्रकारों के क्षेत्रों को छोड़ कर ही करना होगा।

वृषणौ बस्ति मेदं च नाभ्यूरु वंक्षणौ गुदम् ।

अपानः स्थानयंत्रस्थः शुक्रमूत्रशक्रुति सः ॥

सृजत्यातैवगभा च.....( च. वि. अ. २८ )

अर्थात् वृषण, बस्ति, शिश्न, नाभि, ऊरु, वंक्षण इन स्थानों में जो शुक्र, मूत्र, पुरीष, आतैव व गर्भ इनके उत्पादक और बाह्य यंत्र हैं उनमें अपान रहता है। अपान, शुक्रादिकों को पैदा भी करता है और बाहर भी निकलता है।

हमारी राय में उक्त प्राणादि प्रभेदों का पुनः संशोधन किया जाना आवश्यक है।

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पित्त के प्रकार

पित्त के भी पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और आजक नाम के पाँच प्रकार किये जाते हैं। तहां पाचक का इतिहास अम्ल-प्रपाक से आरम्भ होता है। रंजक के विषय में यह विचारणीय है कि इसका ज्ञान सर्व प्रथम देहगत प्रकृति विकृति वणों पर से हुआ अथवा रसरंजन पर से। साधक के विषय में यह तर्क है कि आत्मा हृदय में जिस अन्न के सहारे रहता है उस अन्न को पित्त के प्रकारों में शामिल करने के हेतु से साधक कहा गया है। आलोचक का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है पर यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि आलोचक व आजक का सम्बन्ध तेज संज्ञक वसा से है और यह संबंध, तेज का पित्त में अतर्भाव होने के बाद प्रस्थापित हुआ होगा।

यह स्वीकार करने पर भी कि उक्त घटनाओं के कारण इन पित्तों का ज्ञान हुआ; आरम्भ में इनका 'नामतः' अलग २ उल्लेख नहीं किया जाता था। इसका एक कारण यह भी है कि कुछ संप्रदाय अग्नि व पित्त को भिन्न २ मानते थे तो कुछ पित्त में ही अग्नि का अन्तर्भाव करते थे और तदनुसार दोनों की भाषा भिन्न २ थी। और इस दृष्टि से 'अग्निरेव क्षीरेषु' इत्यादि मारीचि का विधान (देखो पृ. ८८) मननीय है। मालूम होता है कि इन विधानों के समय तक पित्त का पंचधा और नामतः विभक्तीकरण नहीं किया जाता था। पंचधा विभक्तीकरण का आरंभ 'रागपक्षयोजस्तेजो मेघोष्मकृत् पित्तं पंचधा प्रविभक्तमग्निकर्मेणातुग्रहं करोति' (सु. सू. अ० १५) इस विधान से होता हुआ दिखाई देता है।

पाचक पित्तः— पङ्कसवादियों के समय में आमशय को केवल श्लेष्मा का स्थान और पित्त व अग्नि को भिन्न २ माना जाता था।

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अतः वे कहते थे कि 'आमाशय में अन्न का जो पाक वा विदाह होता है वह आमाशय के अधोभाग में स्थित अग्नि के उष्मा से होता है; जैसा कि चूल्हे की आंच से बटलोही में चांबल पकते हैं। पाक की पहिली अवस्था में अन्न, मधुर व फेन युक्त होता है और उससे ऋध्मा पैदा होता है। पार्क की दूसरी अवस्था में अन्न, विदग्ध और अम्लकल्प बनाता है। (चूंकि जब कि इनकी दृष्टि से अम्लता का कारण 'अग्निजन्यपाक' है तब सम्भव है कि इनके समय में आमाशय गत 'अम्लपित्त' का ज्ञान न हुआ हो) यह अन्न, जब आमाशय से नीचे आता है तब वहाँ उसकी अम्लता के कारण शुद्ध पित्त पैदा होता है। इस पित्त से यद्यपि आगे अन्न का पाचन होता है तथापि इस पाचन व्यापार में अग्नि ही प्रधान कारण है'। (च. चि. अ. १९)

अग्नि को पृथक् व प्रधान मानने वाले पंचात्मकलोकपक्षीयों के कथन का सार पहिले वर्गीकरण में 'अग्निसंयुक्तिवलेन यथा-स्वेनोष्मणा सम्पन्निवपच्यमानम्' इसमें आया ही है। इसी को अधिक स्पष्ट इस तरह किया है कि:— 'भौमोप्याग्नेयवायव्याः पंचोष्माणः सनाभसाः। पंचाहारगुणान्स्वान्स्वापार्थिवादीन्यचंति हि ॥ यथा स्वं स्वं च पुष्यंति देहद्रव्यगुणाः पृथक् । पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषांश्च कृत्स्नशः ॥ सप्तभिर्देह धातारै द्विविधाश्च पुनः पुनः । यथास्वमग्निभिः पाकं याति कटिप्रसादवत् ॥ (च. चि. अ. १९) इसमें ऋध्मा शब्द पित्त वाचक है। उसको भौम, आप्य, ओम्य, वायव्य, नामस् इन् पांच प्रकारों में विभक्त किया जाना तथा इनके द्वारा अन्नगत अपने २ पार्थिवादि पांच आहार गुणोंका पाचन होना विशेष चिंतनीय है। इसपर से ज्ञात होता है कि उनको आहारगत भिन्न २ अंशों का भिन्न २ पित्तों के द्वारा पाचित होना प्रतीत होगया था। फिरभी वे इस पाचन व्यापार में अग्नि को ही प्रधान मानते थे।

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इस तरह अग्नि को अलग मानते हुए उसके स्थान आदि का कुछ भी विचार न हो; यह संभव नहीं है। इस विषय में तंत्रान्तरोक्त 'वामपार्श्वोभ्रितं नामभेः किञ्चित्सोमस्य मंडलम्। तन्मध्ये मंडले स्यैव तन्मध्येऽग्निर्व्यवस्थितः ॥ जरायुमात्रप्रच्छन्नः काचकोपस्थ दीपवत्। और 'स्थूल कायेषु सत्वेषु यवमात्रं प्रमाणतः। ह्रस्वकायेषु सत्वेषु तिलमात्रं प्रमाणतः। कृमिकीटपतेषु बालमात्रोऽवतिष्ठते' इत्यादि वचनों को अनुमान के लिये उद्धृत करना अनुचित न होगा। और प्रायः इस कारण ही 'जाठरो भगवान्गिनीश्वरोऽब्रस्य पाचकः। सौष्टम्याद्रघानाद-दानो विवेकु नैव शक्यते'। (सु. सू. अ. २५) इत्यादि कहा जाता होगा।

किंतु जब यह सवाल पैदा हुआ कि 'अत्र जिज्ञास्यं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निराहोस्त्रित्यत्तमेवाग्निरिति' तब यह निर्णय हुआ कि 'न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरूपलभ्यते, आग्नेयत्वात् पित्रे दहनपाचनादिष्वभिवर्तमानेऽग्निवदुपचारः क्रियतेऽन्तरिगरिति। क्षीणे क्षग्निगुणे तत्समानद्रव्योपयोगादतिदृढे शीतक्रियोपयोगादागमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति'। (सु. सू. अ. २१) इस तरह अग्नि का अलग अस्तित्व अस्वीकार किये जाने पर अग्नि शब्द का अर्थ कहीं पित्त तो कहीं पित्तगत 'अष्टद्वहेतु' भी होने लगा और अग्निस्थान भी पित्तस्थान प्रतीत हुआ। अस्तु.

आमाशय के नीचे 'पित्तधरा कला' है। इस कला के भीतरी हिस्से में जो 'स्लेष्मधराकला' Mucous Membrane है उस पर अब की अम्लता (वास्तव में आमाशयगत अम्लपित्त) का संस्कार होते ही यकृत में (और क्रोम Pancreas में भी) पित्त पैदा होकर गिरने

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लगता है। वैज्ञानिक इसका एक कारण यह भी बतलाते हैं कि उत्कृष्टपदार्थकला पर अन्नरस की अम्लता का संस्कार होकर 'मिश्रतत्त्व' नामक 'अभिभूत' पैदा होते हैं। इन अभिभूतों का याकृत पाचक-पित्तोत्पादक जीवाणु (याकृत कालखंड के अन्दर जो छोटे २ 'पित्तकोष' हैं उनकी दीवाल में ये रहते हैं) ओं के साथ कुछ अज्ञात सम्बन्ध है जिसके कारण उत्कृष्ट जीवाणु, समीप के रक्त से अपेक्षित अंश लेकर (पित्त रक्तस्थ विकृतिः) पित्त पैदा करते हैं। इसी तरह क्लौम पाचकपित्त भी तैयार होता है।

पित्त को ही अग्नि कहने वालों का कथन है कि 'तच्च अदृष्ट हेतुकेन विशेषेण पक्वामाशयमध्यस्थं पित्तं, चतुर्विधमन्नपानं पचति विरेचयति च रसदोषमूत्रपुरीषाणि, तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शोषणां पित्तस्थानानां शरीरस्थं च अग्निर्भ्रमणानुग्रहं करोति। तस्मिन्निष्ठे पाचकोऽग्निरिति संज्ञा' (सु. सू. अ. २१) अर्थात् आमपकाशयमध्यस्थ पित्त, किसी अदृष्ट (इसका अर्थ 'देव' करने के बजाय अग्नि अथवा अभिभूत करना उचित है) कारण विशेष के द्वारा चतुर्विध अन्नपान को पकाता है। वह रस, दोष, मूत्र व पुरीष का विरेचन भी करता है। तथा अन्नस्थ पित्त ही अपनी शक्ति से शेष पित्तस्थानों मुख, आमाशय, क्लौम, व क्षुद्रांत्रों को पित्तोत्पादन में सहायता करता है और अपने अग्निवत् कर्म से शारीर धातुओं का भी पाचन करता है। इस पित्त को ही 'पाचक अग्नि' कहते हैं।

१ जिन जंतुओं के द्वारा 'आमषवण' व्यापार (जैसा कि अरिष्ट, आसव, आदि बनाने के समय) होता है उनको सामान्यतः 'अभिभूत Enzyms' कहते हैं। पित्तों में मिश्रतत्व Secretin लालसत्व, Taylin पाचकसत्व Pepsin आदि अभिभूत रहते हैं।

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इसमें अन्य पित्तस्थानों का अर्थात् अन्य पाचक पित्तों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी याकृत पाचक पित्त को सर्वे श्रेष्ठ और सर्वोपकारक कहा गया है। और यही कारण है कि आयुर्वेद में इस पाचक पित्त का कुछ अधिक विवेचन उपलब्ध होता है। यहाँ 'ओष्ण्यं तैश्चण्यं लाघवमनतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्णो गंधश्च विलो रसो च कटु काम्लो पित्तस्यात्मरूपाणि, एवं विधत्वाच्च कर्मणः स्नालक्षण्यभिदमस्य भवति' ( च. सू. अ० २० ) और 'पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीरुं पीतं तथैव च। उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्बुकेव च ( सु. सू. अ. २१ ) इन विधानों को ध्यान में रखना चाहिये। इनका विश्लेषण व संशोधन करना होगा।

अब यह जाना गया है कि महास्रोत की श्रेष्ठधारा कला में उदकोत्पादक व पित्तोत्पादक सहजों पिंड हैं और वे अपरा ( जरायु ) से ( जैसा कि कांच से दीप ) आन्च्छादित भी हैं। अतः इनको ही 'सोममंडल' और 'सूर्य मंडल' कहना उचित है।

स्थान विभागानुसार पाचक पित्त के पांच प्रकार होते हैं और उनके द्वारा भिन्न २ अंशों का पाचन होता है। जैसाकि:—

(१) मुखगत पाचकपित्तः—यह 'लुलुकाधःस्थपिंडों' से पैदा होता है। इसमें 'लालासत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। इससे पिष्ट षट्पिंडों के कण बारिक होते हैं। 'पष्टिक' अन्नसे 'पिष्ट सत्व' और पिष्टसत्व से 'पैडीशर्करा' का बनना इसीसे आरंभ होता है।

(२) आमाशयस्थ पाचकपित्तः—इसका वास्तविक नाम 'अस्लपित्त' है। यह अमाशयस्थ पिंडों से पैदा होता है। इसमें 'पाचक सत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। किंतु इसमें पाचन के समय लाला

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आयुर्वेदिक दर्शन

और ऋदक दोनों मिश्र रहते हैं। और इस मिश्रण को ही 'जाठरस'। Gastric juice कहते हैं। जाठरस, अम्लकल्प और जंतुह्र है। पाचकसत्व में 'पौष्टिक' द्रव्यों के पाचन का धर्म है। इससे इक्षुशर्करा का फलशर्करा में या द्राक्षाशर्करा में परिवर्तन होता है। जाठरस से कुछ अंश में वसा का प्रयुक्करण होता है, दूध का दही बनता है और पिष्ट का पिष्टसत्व बनकर उससे पौष्टीशर्करा बनती है। किंतु इसका प्रधान कार्य पौष्टिक द्रव्यों का पाचन ही है।

(३) याकृत पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त प्रकार से याकृत जीवाणुओं से पैदा होता है। यह पीला, हल्का पीला हल्का लाल, या हल्का हरा रहता है। इसका गंध, कस्तुरी मायल और रस, मधुर तिक्त व अनुक्षार होता है। इसमें सैघवलवण, शारीर मद्य, वसा, ऋदक कफ, रंजक पित्त और कुछ खनिजक्षार मिश्र रहते हैं। वसा के पाचन में यह क्लोम पाचकपित्त का सहायक है। इससे पौष्टिक अन्न का पिंडीभवन (पिंडितम्) होता है। यह कुछ अंश में सारक भी है। इसमें विशेषता यह है कि यह अन्न के साथ पकाशय में से होता हुआ 'अन्नरसवहा' शिराओं में और वहां से वापिस यकृत में चला जाता है। मल के साथ कुछ बाहर भी निकलता है।

(४) क्लोम पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त तरीके से क्लोम में पैदा होता है। इसमें चार प्रकार के अभिपूत (अष्ट हेतु) रहते हैं। पोषकपाचक, पिष्टपाचक, वसापाचक और दधुत्पादक। अम्लकल्प पौष्टिक द्रव्य के पाचन में जिस तरह पाचकसत्व अधिक सफल होता है उस तरह क्षारकल्प पोषकद्रव्य के पाचन में 'पोषकपाचक' अधिक सफल होता है। अत्रत्य पिष्टपाचक से पिष्टपदार्थों का पौष्टी-

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शर्करा बहुत शीघ्र बनती है। अत्रत्य वसापाचक से वसा का क्षीरी-भवन होकर वसाम्ल और वसामधु बनते हैं। दधुपादक से दूध का दही बनता है। क्लौम पाचकपित्त, क्षारकल्प और अन्नकोथ कारक है।

(५) श्रुद्रांत्रस्थ पाचकपित्तः—यह श्रुद्रांत्रगत सोममंडलमध्यस्थ सूर्यमंडलों से पैदा होता है। इसमें परिवर्तक संज्ञक अभिषूत रहते हैं। इनके द्वारा इक्षुशर्करा का मधुशर्करामें व फलशर्करा में परिवर्तन होता है। यह पित्त, मांसल द्रव्य के पाचन में क्लौम पित्त का सहायक है। केवल क्लौम पित्त में अथवा केवल इस पित्त में पोषक द्रव्यों के पाचन का उत्तना सामर्थ्य नहीं है जितना कि दोनों के मिश्रण में है। इस पित्त से वसा की अपेक्षा पोषक द्रव्य के पाचन का धर्म अधिक है। उक्त मिश्रण इतना तेज है कि खाली पेट में यह आंतों में सूजन पैदा करता है।

श्रुद्रांत्र में अभिषूतों के द्वारा पिष्ट का दुर्धाम्ल तथा उससे ‘अंगारद्विमित्र,’ Corbon-di-oxide ‘उज्जन’ और ‘नवनीताम्ल’ बनता है। पैंछी भुस्सी का पृथक्करण होता है। अंगारद्विमित्र के पैदा होने पर पेट में अनेक वायवीय द्रव्य [ कठु प्रपाकजन्य वायु ] पैदा होते हैं। इनकी वानस्पत्य अन्न से अधिक पैदाहृष होती है। वसा का क्षीरीभवन होता है और उससे वसाम्ल बनते हैं। पोषक द्रव्य से मांसघटक द्रव्य तथा पोषकाम्ल बनते हैं। इन अभिषूतों के द्वारा जब पोषक द्रव्यों का पाचन होता रहता है तब अत्यंत दुर्गीध युक्त वायु पैदा होते हैं। श्रुद्रांत्रस्थ अन्न का ‘कोथ’ भी पाचन में सहायक है और पाचन के समय में जो क्षारकल्प विषं पैदा होते हैं उनका प्रत्यनीक है।

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आयुर्वेद सूक्ष्म

रंजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि 'यत्तु यकृत- प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा, स रसस्य रागकृद्भुक्तः' । (सु. सू. अ. २१) अर्थात् रंजकपित्त, यकृत और प्लीहा में रहता है। यह रस को रंगता है। इस रंजन के विषय में यह कहा गया है कि 'आहारस्य यस्तेजोभूतः सारः परमसूक्ष्मः स 'रस' इत्युच्यते। तस्य च द्रव्यं स्थानम्। स खल्वाप्यो रसो यकृतप्लीहानो प्राप्य राग- मुपैति। रंजिता स्तेजसात्वापः शरीरस्थेन देहिनाम् । अन्वापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते' । (सु. सू. अ. १३) इत्यादि।

उक्त विधान में यद्यपि रंजकपित्त के द्वारा रसरंजन ही बत- लाया है तथापि मारीचि के कथन के अनुसार शरीर के भिन्न २ वर्ण भी इसी के कारण हैं।

यकृत में याकृत जीवाणुओं के बीच में से 'पित्त केशिका'ओं (Bile Capillaries) की केशिकाओं शाखा प्रशाखाएँ फैली हुई हैं। उक्त केशिकाएँ इतनी सूक्ष्म हैं कि उनमें एक रक्त कण का भी प्रवेश होना असंभव है। अतः इनमें सिर्फ आययरस (रक्तवारी) रहता है। याकृत जीवाणु, इस आययरस से अपेक्षित अंश को लेकर उससे याकृत पित्त, पैचिक स्नान और रंजक पित्त तैयार करते हैं।

शुद्ध रंजक पित्त के दो प्रकार हैं; (१) रक्तरंजक पित्त और (२) दयावरंजक पित्त। दोनों में भिन्न वायु [प्राण द्रव्य] रहता है पर पहिले की अपेक्षा दूसरे में अधिक रहता है। रक्तरंजक पित्त (Billi Rubin) से शरीर में पीला, सुनहरा, नारंगी, और लाल रंग रहते हैं। दयावरंजक पित्त (Billi Verdin) से नीला व हरा रंग रहता

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है। मनुष्य के पित्त में श्वाव की अपेक्षा रक्तरंजक अधिक रहता है। किंतु स्त्री में इनके मिश्र प्रकार ही पाये जाते हैं। जैसाकिः—

लोहित रंजक पित्तः—इसमें लोह रहने के कारण इसको 'लोहित' कहा है। इसके दो प्रकार उपलब्ध हैं; (१) 'समित्र' और (२) 'अस्मित्र' अथवा 'अमित्र'। पहिला प्रकार धमनी गत रक्त में रहता है। दूसरा प्रकार शिरागत रक्त में अथवा जब रक्त को मित्र वायु प्राप्त नहीं होता तब समस्त रक्त में रहता है। मित्रवायु को शोषित करने का इसमें धर्म है। एक रक्ती लोहितरंजकपित्त, एक मांसा मित्रवायु को शोषित करता है। इस अवस्था में रक्त का रंग बिलकुल लाल रहता है। किंतु इसमें मित्रवायु की मात्रा जितनी कम रहती है उतनी ही उसमें श्वावता रहती है। आयुर्वेद में रक्त के 'जीवरक्त' और 'श्वावरक्त' दो प्रकार माने जाते हैं। मित्रवायु का कुछ अंश शिरागत अथवा श्वावरक्त में भी रहता है। कुछ विकृतियों में लोहित रंजक पित्त के साथ मित्रवायु का इतना घनिष्ठ संबंध होता है कि वह आसानी से अलग नहीं होता।

यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि शुष्करक्त से (अर्थात् ही लोहितरंजक पित्त से) जो लोहरहित रंजकपित्त अलग किया जाता है वह यकृतस्थ 'रक्तरंजकपित्त' के बिलकुल सदृश है। दोनों की पैदाइश एक ही जगह से होती है और रासायनिक परीक्षा द्वारा दोनों में सरीखे द्रव्य पाये जाते हैं। लोहितरंजकपित्त के विघटन या न्यूनता से (आयुर्वेदानुसार प्रकोप से) पांडु, कामला, हर्लमक इ. रोग पैदा होते हैं। यकृत में लोहित रंजक पित्त रहता है और उससे उक्त रक्त-रंजक और श्वाव रंजक दोनों का प्रथकरण होता है। शेष लोह याकृत जीवाणुओं में संचित किया जाता है।

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आधुनिक-दर्शन

लौहित रंजक पित्त, यकृत में जिस तरह पृथक् उपलब्ध होता है उस तरह प्लीहा में पृथक् उपलब्ध नहीं होता।

लोह रहित रंजक पित्त, भी सृष्टि में पाया जाता है। मनुष्य के मूत्र में यह रहता है।

शुद्रांत्रस्थ रंजक पित्तः—यह शुद्रांत्रस्थ क्षार तथा याकृत पित्तस्थ रक्तरंजकपित्त के संयोग से पैदा होता है। यह पुरीष में तथा रक्त के द्वारा मूत्र में पाया जाता है। तदनुसार इनको पुरीषरंजक, और मूत्र-रंजक भी कह सकते हैं।

वसारंजक पित्तः—यह वसा में और अंडे की जर्दी में रहता है।

त्वकरंजक पित्तः—बाह्य त्वक में सबके नीचे 'ताम्रा' त्वक है। उसमें रंगीन कण हैं, (इन कणों को 'तेजो धातु' भी कहा गया है; जैसाकि च. शा. अ. ८ और सु. शा. अ. २ में) इन कणों की वर्ण भिन्नता के कारण ही भिन्न २ मनुष्यों का भिन्न २ वर्ण रहता है।

१ प्लीहा के अंतर्भाग (अंतः प्लीहा) का रंग काला, लाल या भूरा है। इन वर्णों के जीवाणुओं से ही यह बना हुआ है। रंगीन जीवाणुओं के आसपास कुछ स्वयंच्छ कण, रक्त कण, और बड़े लाल कण रहते हैं। प्लीहा में रक्तस्थ श्वेत कण बनते हैं। प्लीहाभिन्वद्वि का व रक्तजन्य पांडुता का संबंध है। कुछ प्राणियों की प्लीहा में रक्त कण भी बनते हैं। रक्त कणों की जीवितयात्रा समाप्त होने पर वे कायकल्प के लिये प्लीहा में आते हैं। यहाँ उनकी अनेक विर्यायमाण अवस्थाएँ उपलब्ध होती हैं। आमाचार को रक्त की सहायता करने के लिये प्लीहा में रक्तसंचय होता है। प्लीहा में मस्तुयुक्त ऋणों का प्रथक्करण होता है। प्लीहा, अंतःस्त्री पिंड है। शरीर में इसके सदृश कार्य करने वाले कुछ और भी पिंड हैं।

परिशिष्ट

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नेत्र रंजकपित्तः—यह लोहयुक्त है और नेत्र के 'कालक' में रहता है। इस जाति का रंजक नीग्रों जाति की त्वचा में भी रहता है। शरीर के किसी २ ( संधानक ) घातु में, अपरा में और नाडियों में भी पाया जाता है।

केशरंजक पित्तः—बालों में अनेक प्रकार के रंग रहते हैं। इन रंगों के कारण किसी के बाल काले तो किसी के भूरे रहते हैं। इसके अभाव में बाल सफेद हो जाते हैं।

साधक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—

यत् पित्तं हृदयस्थितं तस्मिन् साधकोऽभिरिति संज्ञा; सोऽभिप्राथितमनोरथसाधनकृदुक्तः ॥ (सु. सू. अ. २१)

जो पित्त हृदय में रहता है उसको साधक अग्नि कहते हैं अथवा उसमें स्थित अग्नि को साधक कहते हैं। वह मन के अपेक्षित विषयों का साधक है।

हृदय के विषय में विशेषतः दृढ़त घातुप्रसाद के विषय में दो तरह से विचार किया जाता था; एक करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से और दूसरा आत्मस्थान की दृष्टि से। जब करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से विचार किया जाता था तब हृदयस्थित घातुप्रसाद को शीर्षस्थित प्राण का संचार क्षेत्र कहा जाता अर्थात दृढ़त घातुप्रसाद, एक 'वायवीयद्रव्य' माना जाता। किंतु जब आत्मस्थान की दृष्टि से विचार किया जाता तब इसको 'पित्त' शब्द से संबोधित किया जाता। उक्त विधान इस दृष्टि से ही किया गया है।

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आयुर्वेद-दर्शन

क्योंकि प्रायः सभी आर्य वैज्ञानिक हृदय धातुप्रसाद में लिंगदेहधारी जीवात्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। उपनिषदों में यह कहा गया है कि “हृदय कमल के भीतर सूक्ष्मतर आकाश में अपने अन्न (तन्त्र धातुप्रसाद ) के सहारे ‘जीवात्मा’ स्थित है। हृदय कमल से एक तो एक ( प्रत्यक्ष में अभी एक का ज्ञान हुआ है ) सूक्ष्म ज्ञान वाहिनियों निकलती हैं जिनके कि सहस्रों प्रश्नखाएँ होती हैं। हूकमलस्थ लिंग देहधारी आत्मा, इन नाडियों द्वारा बुद्धि, मन, इन्द्रिय इनके विषयों की जानकारी प्राप्त करता है। “मैं हूँ” इसमें जो ‘अहंभाव’ अथवा व्यक्तित्व है वह जीवात्मा का परिचय है। योगी, इस जीवात्मा को ‘उदान’ वायु के द्वारा ‘सुषुम्ना’ नाडी के रास्ते से ऊपर मूर्द्धा में मैं ले जाते हैं और वहाँ (शिव रहता है) जीव शिवात्मैक्य का अनुभव करते हैं। योगी, इस जीवात्मा में लीन होकर जो चाहता है वही प्राप्त करता है।” (छांदोग्य, बृहदारण्य, तैत्तिरीय, मुंड और कंड से संग्रहित) और आयुर्वेद में भी यह कहा गया है कि:—

“षडंगमंगं विज्ञानभिद्रियाण्यर्थपंचकम् । आत्मा च सगुणश्वेतश्विन्तयं च हृदि संश्रितम् ॥ प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते । गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थाचित्तैः । तस्योपघातान्मूच्छार्थं भेदान्मरणमूच्छति । तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंप्रहः ॥ हृदयं महदर्थक्ष्म तस्मादुक्तं चिकित्सकैः ।

अर्थात् हृदय, षडंग शरीर का केंद्र है, उसमें ही अर्थ ज्ञान और विज्ञान होता है। सगुण आत्मा और मन हृदय में ही रहते हैं। उक्त

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भावों के प्रतिष्ठार्थ ही हृदय है। हृदय के आवात से मूर्च्छा और भेद से मरण होता है। वह परभोज का स्थान है और उसमें चैतन्य का संग्रह है”।

सारांश यहाँ हृदय स्थित धातुप्रसाद को साधक पित्त शब्द से संबोधित किया गया है और सम्भवतः आत्मा को अग्नि शब्द से। आत्मा को अग्नि शब्द से संबोधित करना तत्कालीन प्रथा के अनुरूप ही है। सिवाय यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त साधकपित्त कल विवेचन उन संप्रदायों के द्वारा किया गया है जो ‘वायु द्रव्य’ का प्राणादि प्रकारों में वर्गीकरण करते थे। ये जिस तरह द्रवत धातुप्रसाद को पित्त कहते हैं उस तरह नेत्रगत धातुप्रसाद को भी पित्त कहते हैं।

आलोचक पित्तः—इसके विषय में यह कहा है किः—

यत् दृष्ट्वा पित्तं तस्मिन् आलोचकोऽग्निरिति

संज्ञा, स रूपग्रहणेऽधिकृतः॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त दृष्टि में रहता है उसको आलोचक अग्नि कहते हैं। वह रूप ग्रहण करता है।

दृष्टि के विषय में यह कहा गया है किः—

नेत्रायामग्निभागं तु कृष्णमंडलमुच्यते ।

कृष्णात् सप्तमभिच्छंति दृष्टि दृष्टिविशारदाः ॥

पक्षमवर्त्मश्वेतकृष्णदृष्टीनां मंडलानि तु ।

अनुपूर्वं तु ते मध्याश्वत्वारोऽत्या यथोत्तरम् ॥

(सु. सू. अ. १)

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आयुर्वेद-दर्शन

मसूरदलमात्रों तु पंचभूतप्रसादजाम् । खद्योतविस्फुल्लिगामां सिद्धां तेजोभिरन्यैः ॥ आवृतां पटलेनाक्षणोर्बोहान विवराकृतिम् । क्षीतसात्स्यां नृणां दृष्टिमाहुर्नयनचित्ताकाः ॥

( सु. उ. अ. ७ )

नेत्र में बाह्यपटल के पीछे जो ' कृष्ण मंडल ' दिखाई देता है उसके पीछे रंगीन धातुओं का बना हुआ विवर युक्त ' दृष्टि मंडल ' है । शारीर शास्त्र दृष्ट्या दृष्टिमंडल गत विवर को ' दृष्टि ' कहते हैं । ' दृष्टि ' शब्द का यदि इतना ही अर्थ स्वीकार किया जाय तो इस दृष्टि में अथवा विवर में जो ' तेजोजल ' भरा हुआ है उसको ' आलोचक ' पित्त कहना होगा । यह दृष्टि में बाह्यपटल से भीतर तृतीयपटल ( अक्षिकाच Lens ) तक भरा हुआ है । अतएव यह कहा भी है कि ' सिद्धां तेजोभिरन्यैः ' और ' तेजोजलाश्रितं बाह्यम् ' इ० । यह तेजोजल, रक्त से परीजने वाला एक तरल है । इन्द्रिय धर्म शास्त्र की दृष्टि से यह तेजोजल ' वक्त्रीकरण सहित्यों ' में से एक है । इसके द्वारा प्रकाश किरणों का ' वक्त्रीभवन ' होता है ।

किंतु ' रूप ग्रहण ' की दृष्टि से विचार किया जाय तो यहाँ ' दृष्टि ' शब्द का अर्थ अधिक व्यापक करना होगा । रूप ग्रहण अथवा आलोचन शब्द, यद्यपि सामान्यतः उन सब व्यापारों के वाचक हैं जिनसे कि बाह्य दृष्य का प्रतिबिंब, चतुर्थपटल के 'लिंग' भाग पर पाडा जाता है तथापि उसका विशेष अर्थ ' रूप ज्ञान ' है और वह अभिप्रेत भी मादूम होता है । ऋषियों को यह भली भांति मादूम था कि रूप ज्ञान में ' लिंग ' भाग ही प्रधान कारण है और लिंग