भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

अतः वे कहते थे कि 'आमाशय में अन्न का जो पाक वा विदाह होता है वह आमाशय के अधोभाग में स्थित अग्नि के उष्मा से होता है; जैसा कि चूल्हे की आंच से बटलोही में चांबल पकते हैं। पाक की पहिली अवस्था में अन्न, मधुर व फेन युक्त होता है और उससे ऋध्मा पैदा होता है। पार्क की दूसरी अवस्था में अन्न, विदग्ध और अम्लकल्प बनाता है। (चूंकि जब कि इनकी दृष्टि से अम्लता का कारण 'अग्निजन्यपाक' है तब सम्भव है कि इनके समय में आमाशय गत 'अम्लपित्त' का ज्ञान न हुआ हो) यह अन्न, जब आमाशय से नीचे आता है तब वहाँ उसकी अम्लता के कारण शुद्ध पित्त पैदा होता है। इस पित्त से यद्यपि आगे अन्न का पाचन होता है तथापि इस पाचन व्यापार में अग्नि ही प्रधान कारण है'। (च. चि. अ. १९)

अग्नि को पृथक् व प्रधान मानने वाले पंचात्मकलोकपक्षीयों के कथन का सार पहिले वर्गीकरण में 'अग्निसंयुक्तिवलेन यथा-स्वेनोष्मणा सम्पन्निवपच्यमानम्' इसमें आया ही है। इसी को अधिक स्पष्ट इस तरह किया है कि:— 'भौमोप्याग्नेयवायव्याः पंचोष्माणः सनाभसाः। पंचाहारगुणान्स्वान्स्वापार्थिवादीन्यचंति हि ॥ यथा स्वं स्वं च पुष्यंति देहद्रव्यगुणाः पृथक् । पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषांश्च कृत्स्नशः ॥ सप्तभिर्देह धातारै द्विविधाश्च पुनः पुनः । यथास्वमग्निभिः पाकं याति कटिप्रसादवत् ॥ (च. चि. अ. १९) इसमें ऋध्मा शब्द पित्त वाचक है। उसको भौम, आप्य, ओम्य, वायव्य, नामस् इन् पांच प्रकारों में विभक्त किया जाना तथा इनके द्वारा अन्नगत अपने २ पार्थिवादि पांच आहार गुणोंका पाचन होना विशेष चिंतनीय है। इसपर से ज्ञात होता है कि उनको आहारगत भिन्न २ अंशों का भिन्न २ पित्तों के द्वारा पाचित होना प्रतीत होगया था। फिरभी वे इस पाचन व्यापार में अग्नि को ही प्रधान मानते थे।