आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट
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इस तरह अग्नि को अलग मानते हुए उसके स्थान आदि का कुछ भी विचार न हो; यह संभव नहीं है। इस विषय में तंत्रान्तरोक्त 'वामपार्श्वोभ्रितं नामभेः किञ्चित्सोमस्य मंडलम्। तन्मध्ये मंडले स्यैव तन्मध्येऽग्निर्व्यवस्थितः ॥ जरायुमात्रप्रच्छन्नः काचकोपस्थ दीपवत्। और 'स्थूल कायेषु सत्वेषु यवमात्रं प्रमाणतः। ह्रस्वकायेषु सत्वेषु तिलमात्रं प्रमाणतः। कृमिकीटपतेषु बालमात्रोऽवतिष्ठते' इत्यादि वचनों को अनुमान के लिये उद्धृत करना अनुचित न होगा। और प्रायः इस कारण ही 'जाठरो भगवान्गिनीश्वरोऽब्रस्य पाचकः। सौष्टम्याद्रघानाद-दानो विवेकु नैव शक्यते'। (सु. सू. अ. २५) इत्यादि कहा जाता होगा।
किंतु जब यह सवाल पैदा हुआ कि 'अत्र जिज्ञास्यं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निराहोस्त्रित्यत्तमेवाग्निरिति' तब यह निर्णय हुआ कि 'न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरूपलभ्यते, आग्नेयत्वात् पित्रे दहनपाचनादिष्वभिवर्तमानेऽग्निवदुपचारः क्रियतेऽन्तरिगरिति। क्षीणे क्षग्निगुणे तत्समानद्रव्योपयोगादतिदृढे शीतक्रियोपयोगादागमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति'। (सु. सू. अ. २१) इस तरह अग्नि का अलग अस्तित्व अस्वीकार किये जाने पर अग्नि शब्द का अर्थ कहीं पित्त तो कहीं पित्तगत 'अष्टद्वहेतु' भी होने लगा और अग्निस्थान भी पित्तस्थान प्रतीत हुआ। अस्तु.
आमाशय के नीचे 'पित्तधरा कला' है। इस कला के भीतरी हिस्से में जो 'स्लेष्मधराकला' Mucous Membrane है उस पर अब की अम्लता (वास्तव में आमाशयगत अम्लपित्त) का संस्कार होते ही यकृत में (और क्रोम Pancreas में भी) पित्त पैदा होकर गिरने