भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

लगता है। वैज्ञानिक इसका एक कारण यह भी बतलाते हैं कि उत्कृष्टपदार्थकला पर अन्नरस की अम्लता का संस्कार होकर 'मिश्रतत्त्व' नामक 'अभिभूत' पैदा होते हैं। इन अभिभूतों का याकृत पाचक-पित्तोत्पादक जीवाणु (याकृत कालखंड के अन्दर जो छोटे २ 'पित्तकोष' हैं उनकी दीवाल में ये रहते हैं) ओं के साथ कुछ अज्ञात सम्बन्ध है जिसके कारण उत्कृष्ट जीवाणु, समीप के रक्त से अपेक्षित अंश लेकर (पित्त रक्तस्थ विकृतिः) पित्त पैदा करते हैं। इसी तरह क्लौम पाचकपित्त भी तैयार होता है।

पित्त को ही अग्नि कहने वालों का कथन है कि 'तच्च अदृष्ट हेतुकेन विशेषेण पक्वामाशयमध्यस्थं पित्तं, चतुर्विधमन्नपानं पचति विरेचयति च रसदोषमूत्रपुरीषाणि, तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शोषणां पित्तस्थानानां शरीरस्थं च अग्निर्भ्रमणानुग्रहं करोति। तस्मिन्निष्ठे पाचकोऽग्निरिति संज्ञा' (सु. सू. अ. २१) अर्थात् आमपकाशयमध्यस्थ पित्त, किसी अदृष्ट (इसका अर्थ 'देव' करने के बजाय अग्नि अथवा अभिभूत करना उचित है) कारण विशेष के द्वारा चतुर्विध अन्नपान को पकाता है। वह रस, दोष, मूत्र व पुरीष का विरेचन भी करता है। तथा अन्नस्थ पित्त ही अपनी शक्ति से शेष पित्तस्थानों मुख, आमाशय, क्लौम, व क्षुद्रांत्रों को पित्तोत्पादन में सहायता करता है और अपने अग्निवत् कर्म से शारीर धातुओं का भी पाचन करता है। इस पित्त को ही 'पाचक अग्नि' कहते हैं।

१ जिन जंतुओं के द्वारा 'आमषवण' व्यापार (जैसा कि अरिष्ट, आसव, आदि बनाने के समय) होता है उनको सामान्यतः 'अभिभूत Enzyms' कहते हैं। पित्तों में मिश्रतत्व Secretin लालसत्व, Taylin पाचकसत्व Pepsin आदि अभिभूत रहते हैं।