भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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परिशिष्ट

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श्रुतगतिचितित का भी गर्भसत्व पर संस्कार होता है। पूर्वजन्माजीत विशेषताएँ उसमें रहती ही हैं और इस जन्म में भी वह विशिष्ट प्रकार का बौद्धिक अभ्यास करता है। इन सब कारणों से सत्व में अनेक विशेषताएँ पैदा होती हैं। अन्यत्र यह भी कहा गया है कि ‘ योनिविशेष और अवयत रचना विशेष के कारण ( अन्योन्यानुविधायित्व के कारण ) सत्व में जो विशेषताएँ पैदा होती हैं उनमें सात्विकादि प्रभेदों और उनके तरतमादि योगों से जो प्रकार होते हैं वे अखेख्य हैं’। संक्षेप में इनका दो तरह से विवेचन उपलब्ध होता है; बलभेदानुसार और महाप्रकृति संज्ञक।

बलभेदानुसारः-सत्वमुच्यते मनः। तत् शरीरस्य तंत्रकमात्मसंयोगात्। त्रिविधं बलभेदेन प्रवरमध्यमवर्गमिति। अतश्च प्रवरमध्यावरसत्वा भवति पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्वाः स्वत्पास्ते सारेपूषदिष्टाः। ( यथा स्मृतिमंतो, भक्तिमंतः, कृतज्ञाः, प्राज्ञाः, शुचयो, महोत्साहा, दक्षा, धीराः, समरविर्कांतयेधिनः, त्यक्तविषादाः, स्ववस्थितगततिर्गभीरखुडिचेतसः, कल्याणाभिनिवेशिनश्च ) स्वल्पशरीराद्यपि ते निजगंगुनिमितासु महतीष्वपि पीडास्वव्यथा दृश्यंते सत्वगुणविशेष्यात्। मध्यमसत्वास्तु अपरानात्मस्युपधाय संस्तंभयत्यात्मनात्मानं परैश्रापि संस्तंभ्यंते। हीनसत्वास्तु नात्मना नापि परैः सत्वबलं प्रति शक्यंते उपस्तंभयितुम्। महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदानामसहा दृश्यंते; सन्नद्धितभयशोकलोभमोहमाना रोद्रभैरवद्विष्टभीमस्तविकृत संकथास्वपि च पशुपुरुषमांसशोणितानि चाविश्य विषादवैषण्यमूर्च्छांमाद अमप्रपतनानामन्यतममानुबल्यथा मरणमिति। (च. वि. अ. ८)

सत्व कहते हैं मन को। वह आत्मा के संबंध से शरीर का संज्ञक है। बल के प्रवर, मध्य और अवर भेदानुसार वह तीन प्रकार

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