भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

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आयुर्वेद-दर्शन

का है। अतः पुरुषों में भी प्रवरसत्व, मध्यसत्व और अवरसत्व इस तरह तीन प्रकार दिखाई देते हैं। तहां प्रवर सत्व, जो कि कम उपलब्ध होते हैं; उनका वर्णन सार के विवेचन में किया गया है। (ये स्मृतिशास्त्री, भक्तिमान, कृतज्ञ, बुद्धिमान्, पवित्र, बड़े उत्साहयुक्त, अपने कार्य में दक्ष, धैर्यशील, समर में खूब लड़ने वाले, विषाद रहित सुस्थिरगति, गंभीरबुद्धि और कल्याणचित्तक होते हैं) छोटे डील वाले होते हुए भी इनका सत्व बलवान् होता है। फलतः वे निजगंतुक व्याधियों के कष्ट सहन करते हुए दिखाई देते हैं। मध्य-सत्व पुरुषों में यद्यपि कष्टसहिष्णुता कम होती है तथापि दूसरों के ढाटस को देख कर अथवा दूसरों के द्वारा ढाटस दिये जाने पर उनको धैर्य आ जाता है। किंतु हीनसत्व पुरुष किसी अवस्था में भी धैर्य नहीं रख सकते। उनका डील कितना ही बड़ा क्यों न हो पर वे तनिक भी कष्ट सह नहीं सकते। भय, शोक, लोभ, मोह सब्दा उनके पास रहते हैं। उग्र, भीतिप्रद, क्रोधयुक्त, बीभत्स या विकृत बातों को सुनकर अथवा प्राणियों के रक्त-मांस को देखकर उनको बड़ा दुःख होता है, चेहरा फीका पड़ जाता है, मूर्च्छा आंन लगती है, भ्रम हो जाता है, उन्माद होता है, पतन होता है और कदाचित् मृत्यु भी होती है।

महाप्रकृति संज्ञकः —शुद्ध सत्व, दोष रहित और कल्याणांश युक्त रहता है। यह ब्राह्म, आर्य, ऐंद्र, याम्य, वरुण, कौवेर और गांधर्व इस तरह सात प्रकार का है और तदनुसार शुद्धसत्व पुरुष भी सात प्रकार के हैं। तहां:—

(१) ब्राम्ह काय पुरुषः—ये पवित्र, सत्यपरायण, जितेंद्रिय, न्यायप्रिय, ज्ञानविज्ञान सम्पन्न, वक्ता, जिम्मेदार, स्मरण रखने वाले,