भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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पारिशिष्टमहत्त्व का आत्मवाद

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त्रयोविंशतिक प्रश्नोत्तरों के रूप में प्रथित किया है और उसमें कहीं २ षड्धातुवाद के मतों को भी शामिल कर दिया है। फलतः यह जानना कठिन है कि उसमें जिन आत्मसमर्थक युक्तियों का संग्रह किया है उनमें षड्धातुवादियों की कितनी और आत्मवादियों की कितनी है।

आत्मवादियों का सृष्टिविज्ञान चतुर्विंशतिक है। वे कर्म-पुरुष को २४ धातुओं का समुदाय कहते हैं। तहां अन्यत्क ( आत्मा या अनादिपुरुष ) बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये आठ धातु 'प्रकृति' अथवा 'भूत प्रकृति' संज्ञक होकर मन, दश इंद्रिय और ५ अर्थ मिलकर सोलह विकार संज्ञक हैं।

अन्यत्क पुरुष के अस्तित्व के विषय में इनका कथन है कि "कर्ता और बोद्धा पुरुष का यदि अस्तित्व न माना जाय तो ज्ञान, अज्ञान, सत्य, असत्य, वेद, शुभाशुभकर्म, आश्रय, सुख, दुःख, गति, अगति, वाणी, विज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बंध, मोक्ष, इनका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।" "यदि उसको कारण न माना जाय तो उक्त ज्ञान आदि अहेतुक ही सिद्ध होंगे।" "और यदि उसको बोद्धा न माना जाय तो इनके विषय में न तो ज्ञान होगा और ज्ञानाभाव के कारण उनका प्रयोजन भी न रहेगा।" "अतः कारणज्ञों ने इसको 'कारण' कहा है।" "जो यह कहते हैं कि 'केवल