भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

‘पंचधातु समुदाय ने आत्मनिरपेक्ष होकर देह का रूप धारण किया ’ वे ( स्वभाववादी ) यह भी कह सकते हैं कि ‘कुंभ-कार के बिना ही केवल मिट्टी, चक, दंड आदि से घट बनगया ! ’ जो इस तरह का युक्तिवाद करते हैं वे आगम से बहिष्कृत हैं । सारांश जिन प्रमाणों द्वारा प्रमेय की सिद्धि होती है उनसे यह सिद्ध है कि चेतनाधातुपुरुष ही कारण है ।

कुछ लोग अर्थात् परंपरावादी यह कहते हैं कि “मातृ-पितृ परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारुप्य रहता है और इस कारण उनको पूर्व सहस्र भी कहा जाता है तथापि वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रति समय नवीन २ ( शरीर का प्रत्येक अणु-अवयव नष्ट होता है और उसका स्थान नवीन अणु अवयव ग्रहण करता है ) होती है । सारांश प्रत्येक प्राणी आत्म-तत्त्व रहित पंचधातु विकार समुदाय मात्र होने के कारण और इस समुदाय का परिणाम ही ‘सत्त्व ’ संज्ञक होने के कारण चेतना धातु पुरुष, न कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है ।” इस तरह जो आत्मा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते उनके मत से एक के द्वारा किये हुए कर्म का फल दूसरा भोगता है या नहीं ? चूंकि जब कि प्रत्येक प्राणी अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब यह कहो कि अन्यकृत कर्म का फल अन्य नहीं