भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

ऐने में प्रतिबिंब नहीं पड़ता। किंतु जब विमल करणों का कर्ता के साथ संबंध होता है तब कर्म, वेदना और बुद्धि की प्रवृत्ति होती है। क्योंकि भूतात्मा, (यह समुदायात्मक-पुरुषगत आत्मा की विशेष संज्ञा है) न तो अकेला कर्म में प्रवृत्त होता है और न अकेला फल ही भोगता है। यह सब करण संयोग पर निर्भर है बिना करण संयोग के कुछ नहीं होता। क्योंकि कोई भी भाव अकेला नहीं रह सकता, वह अहेतुक भी नहीं रहता और वह अपने परिवर्तनशीलता को भी त्याग नहीं सकता।

आत्मा विमु और एक है। (‘असर्वगताः क्षेत्रज्ञाः’ कहनेवालों का यह प्रतिवाद है) उपाधि-भेद के कारण तथा देह कर्मानुपाती मन के साथ नित्य संबंध होने के कारण उसमें यद्यपि अनेकता की प्रतीति होती है तथापि एक योनि-गत आत्मा को भी सर्व योनिगतही समझना चाहिये। साधारण अवस्था में वह भिन्न २ शरीर में भिन्न २ स्पर्शनेन्द्रियों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है और इस कारण ही उसे सर्वत्र का ज्ञान नहीं होता, इतनाही नहीं तो प्रति शरीर में भी केश नख आदि के जहां कि स्पर्शनेन्द्रिय नहीं है; स्पर्श का ज्ञान नहीं होता तथापि मन को समाध्यवस्थापन्न किये जाने पर वह छिपी हुई वस्तु को भी देख सकता है।

समुदायात्मक पुरुष की उत्पत्ति के विषय में आत्म-वादियों का कथन है कि:—