आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपारीक्षिमोद्भव का आत्मवाद
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जायते बुद्धिरन्यक्ताद्वबुद्ध्याहमितिमन्यते । परं खादीन्यहंकार उपादत्ते यथा क्रमम् ॥
इसमें सिर्फ प्रकृतिसंज्ञक सत्प्रातुओं के उत्पत्ति का विवेचन है । हमारी राय में यह उत्पत्ति क्रम, सौश्रुतिक ‘तस्मादन्यक्तात्’ से ‘एषा तत्त्वं चतुर्विंशतिव्याख्याता’ तक के विवेचन से और सारुष्यों के विवेचन से भिन्न है । इस भेद को जानना आयुर्वेद-दर्शन के अभ्यासकों के लिए अत्यावश्यक है । इसमें संदेह नहीं कि अन्यत्क आत्मा से पैदा होने वाली बुद्धि आत्मवादियों के मत से भी सत्वरजस्तमात्मिका है । क्योंकि “अन्यक्ताद्व्यक्ततां याति व्यक्ताद्व्यक्ततां पुनः । रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ” इसमें रजस् और तमस् का स्पष्ट उल्लेख है । और जब कि यह बुद्धि ही अहंभाव में परिणत होती है तब अहंकार भी त्रिगुणात्मक है । किंतु इस त्रिगुणात्मक अहंकार के केवल रजस्तमोबहुल अंश से शब्द स्पर्शादितन्मात्राओं का व उनसे आकाशादिकों का पैदा होना आत्मवादियों को सम्मत नहीं है । उनका कहना है कि “सत्त्व-बहुल अहंकार से आकाश, रजोबहुल अहंकार से वायु, सत्वरजोबहुल अहंकार से अग्नि, सत्त्वतमोबहुल अहंकार से आप् और तमोबहुल अहंकार से पृथ्वी पैदा होती है” । आत्मवादियों के उक्त कथन का संग्रह यद्यपि चरक-संहिता में हो न सका तथापि सुभ्रत