आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
यहां यह भी सवाल उठता है कि आत्मवादी अप्रती-घातकत्वादि गुणों को प्रधान मानते थे या शब्दादि गोचर गुणों को ? इस विषय में यद्यपि निश्चय से कुछ नहीं कहा जासकता तथापि दो बातें ध्यान में रखने योग्य हैं । पहिली यह कि आत्मवादी, कर्तृत्व को चेतना से भिन्न नहीं रखना चाहते और तदनुसार आत्मा से सर्व प्रथम बुद्धि का ही प्रादुर्भाव मानते हैं । दूसरी यह कि आत्मवादी अप्रतीघातक-त्वादि लक्षणों का ज्ञान केवल स्पर्शनेन्द्रियद्वारा जैसा कि ‘लक्षणं सर्वभैवैतत्स्पर्शनेन्द्रिय गोचरम् । स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शेहि सविपर्ययः’ । इसमें बतलाया है; होना सूचित करते हैं । फलतः यह संभव है कि वे गोचरगुणों को प्रधान मानते हों । पर इनको वे कारणगुणत्वेन कदापि स्वीकार नहीं करते । अन्यथा आकाशादिकों को प्रकृति कहना भी व्यर्थ है ।
इस तरह गर्भ में अन्वय से अन्य प्रकृति-संज्ञक यद्यर्थ बनजाने पर इंद्रिय-रचना पैदा होती है । यह इंद्रिय-रचना भौतिक रहती है । इसके साधारण ग्यारह विभाग हैं; पांच कर्मेन्द्रिय, पांच ज्ञानेन्द्रिय और एक अतीन्द्रिय । इनको सामान्यतः ‘करण’ भी कहते हैं । इनके द्वारा भिन्न २ कर्मा में प्रवृत्ति और इंद्रियार्थों का ग्रहण होता है । आत्मा, जब तत्तद्विद्रियार्थ विषयक राग