आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपारीक्षिमौद्रस्य का आत्मवाद
२१
से युक्त होता है तब ( शब्दरागान् श्रोत्रमस्य जायते विदितान्तमनः । रूपरागात्तथा चक्षुरार्धं प्राण जिघृक्षया ॥ ) उक्त इंद्रियों की रचना होती है ।
उक्त इंद्रियों में बुद्धि की 'वृत्तियों' का संचार रहता है । इन वृत्तियों को ही 'सत्त्व' अथवा 'मन' कहते हैं । 'एकैकाधिक युक्तानि खादीना भिद्रियाणितु । पंच कर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धिः प्रवर्तते ।' इसका आशय भी यही है । कुछ संप्रदाय इन वृत्तियों को इंद्रियों का परिणाम कहते थे किंतु आत्मवादी इनको आत्मा का ही गुण समझते हैं । जो संप्रदाय चेतना को इन वृत्तियों का परिणाम कहते थे वे इन वृत्तियों को अर्थात् सत्त्व को ही 'चेतस्' कहते थे । किंतु आत्मवादियों का कथन है कि सत्त्व, अचेतन है; उसको चेतनाधातु से चेतना प्राप्त होती है । चेतना प्राप्त होने पर ही सत्त्व स्वकार्य में प्रवृत्त होता है ।
मन के अस्तित्व और रूप के विषय में यह कहा गया है कि:—
लक्षणं मनसोज्ञानस्याभावोभाव एव वा । सतिद्यात्मेंद्रियाथार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते ॥ वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते । अणुत्वमथचैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥