आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 235 में से
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आयुर्वेद-दर्शन
तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तत्सिंह एव, तत्सिंहाश्च महत्-स्वसिंह एवाहंकार उपद्यते । स च त्रिविधो वैकारिक-स्वैजसोभूतादिरिति ।
इस पर से यह ज्ञात होता है कि ये सत्य रज तम की साम्यावस्था को 'अव्यक्त' और वैषम्यावस्था को 'महत्' अर्थात् बुद्धि कहते हैं । इन के मत से गुणों में विषमता पैदा होना ही अव्यक्त से बुद्धि का पैदा होना है । आत्मवादी, साम्यावस्थ सत्वरजतमें को आत्मा के गुण कहते हैं और उनकी साम्यावस्था का 'अव्यक्त' शब्द से अलग उल्लेख नहीं करते । बाकी महत् अथवा बुद्धि शब्द से आत्मवादी भी त्रिगुणों की वैषम्यावस्था को संबोधित करते हैं । त्रिगुणात्मिका बुद्धि से त्रिगुणात्मक अहंकार का पैदा होना दोनों को स्वीकार है । आगे इनका यह कथन है कि:-
तत्र वैकारिकादहंकारात्तैजस् साहाय्यात् तल्लक्षणान्येव एकादशेन्द्रिया ण्युत्पद्यंते । तद्यथा श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वा घ्राणवाक् हस्तोपस्थ पायूपाद् मनसासीति । तत्र पूर्वाणि पंच बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पंच कर्मेन्द्रियाणि उभय्यात्मकं मनः । भूतादेरपितैजस साहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पंचतन्मात्राण्युत्पद्यंते । तद्यथा शब्द-तन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गंधतन्मात्रमिति । तेषां विशेषाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः । तेष्यो भूतानि व्योमानिला-