आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंशारलोमा का सत्त्ववाद
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नलजलोऽर्थः । एवमेषांतत्त्वचतुर्विंशतिवर्ण्यारूढ्याता । तत्र बुद्धी- द्वियाणां शब्दादयो विषयाः । कर्मेन्द्रियाणां यथासंख्यं वचनान- दानानंद विसर्ग विहरणानि ।
इसमें वैचारिक व तैजस गुणाधिक अहंकार से जिन इंद्रियों का पैदा होना बतलाया है वे भौतिक नहीं हैं अपितु ज्ञान के प्रकार हैं । उसी तरह भूतादि व तैजस गुणाधिक अहंकार से जिन तन्मात्राओं की पैदाइश बतलाई गई है वह भी ज्ञान के प्रकार हैं । इनके मत से आगे यह ज्ञान ही शब्दादि गुणों में और ये गुण भी आकाशादि द्रव्यों में परिणत होते हैं । तत्पश्चात् भौतिक इंद्रिय भी पैदा होते हैं । जो संप्रदाय ज्ञान को प्रधान मानते हैं और ज्ञान से ही कर्तृत्व का उदित होना स्वीकार करते हैं उनकी भाषा इसी प्रकार की होती है । आत्मवादी भी इस मत के हैं पर उनमें व इन में भेद यह है कि ये त्रिगुणात्मक अहंकार में गुणोत्पन्न दृष्ट्या दो प्रकार करके एक से एकादश इंद्रियों की व दूसरे से शब्दादि तन्मात्राओं की उत्पत्ति का विधान करते हैं । किंतु आत्मवादी, अहंकार के दो भेद नहीं करते और आकाशादि के उत्पत्ति के पूर्व तन्मात्राओं का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । इस मत भेद का स्पष्ट चित्र उनके प्रकृति संज्ञक आठ तत्वों के उल्लेख में भी दिखाई देता है । क्योंकि अष्टप्रकृतियों के विषय में इनका यह कथन है कि:—