आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायौविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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गत होना स्वीकार करते हैं। जैसा कि 'तास्वंतंरिद्वाद्भ्रज्य- मानाभ्रद्वाष्ट्र पंचमहाभूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां मूर्तिरिभ्रीणयंति यासुमूर्तिषु षड्भिर्भूच्छीति रसाः। तेषां षण्णां सोमातिरेकात् ( अन्यमते भूम्यंबुगुणबाहुल्यात् ) मधुगोरसः। पृथिव्यभिभूयिष्ठत्वादम्लः। सलिखाभिभूयिष्ठत्वाक्ष्वणः। वायव त्रिभूयिष्ठत्वाऋतुकः। वाय्वाकाशातिरेक्तत्वात्तिकः। पवन पृथिव्यतिरेकात् कषाय इति। एवमेषां षण्णां रसानां षट्त्व- मुपपन्नमुनातिरेक विशेषान्महाभूतानां भूतानामिव जंगमस्था- वराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः। षड्भूतुकत्वाच्चकालस्य उपपन्नो महाभूतानाम् ऊनातिरेक विशेषः। (च. सू. अ. २६)
यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि वर्षाजलगत रस का पंचमहाभूतों के गुणों से संबंध होकर स्थावर जंगम प्राणियों की जो 'मूर्तियाँ' पैदा होती हैं उनको पंचात्मक- लोकपक्षीय, 'षड्सात्मक' कहते हैं अर्थात् उनकी दृष्टि से 'मूर्ति' शब्द उन सचेतन द्रव्यों का वाचक है जो स्थावर जंगम प्राणियों के 'घटक' हैं। इन घटक द्रव्यों को वे छः आस्वादों में विभक्त करते हैं। उनका कथन है कि उक्त मूर्ति संज्ञक सचेतन आस्वाद, आर्तविकजलगत रस के साथ पंच- महाभूतों के गुणों का संबंध होकर बने हुए हैं।
अभीषोम लोकपक्षीय भी सोमसंज्ञक रस से सर्व प्रथम मूर्तियों का संगठित होना स्वीकार करते हैं। वैदिक