भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

मत के अनुसार इन मूर्तियों ( विशेषतः सचेतन द्रव्यों ) के औषधि, अन्न, रेतस् और पुरुष ये चार प्रकार हैं जो कि क्रमशः पैदा होते हैं । आयुर्वेद में भिन्न २ दृष्टि से भिन्न २ प्रकार स्वीकार किये गये हैं । उदा० (१) दोष व देह, (२) औषधि (विहजितेबल) व पुरुष ( एनिमल ) और (३) गुणप्रसादाख्यधातु व द्रव्यप्रसादाख्यधातु । इनमें अन्न व रेतस् का इस लिये उल्लेख नहीं है कि पहिले में औषधि व पुरुष दोनों का समावेश है और दूसरे का द्रव्य प्रसादाख्यधातुओं में अंतर्भाव है ।

रस से सर्व प्रथम औषधि संज्ञक सचेतन द्रव्य पैदा होते हैं । ये अन्न व देह दोनों के घटक हैं । षड्रसवादी, इनको सामन्यतः ' दोष ' कहते थे और इनका तथा अन्न का भी वर्गीकरण मधुरादि छः आस्वादों में करते थे । किन्तु जिनका लक्ष्य गुर्वादि गुणों पर अधिक था वे उनके गुरुत्वादि प्रधान स्वभाव के अनुसार उनका २० गुणों में वर्गीकरण करते थे । और इसी हेतु से उनको सामान्यतः 'गुणप्रसादाख्यधातु,' ' शारीरधातुगुण ' ' धातुगुण ' अथवा ' आहार गुण ' कहते थे । आगे इन गुणप्रसादाख्यधातुओं को ओज, तेज, धातुप्रसाद इन तीन विभागों में अथवा ओज व तेज


१ जिन पदार्थों में दूषित होने का अर्थात सड़ने का धर्म हो उनकी यह संज्ञा है । अचेतन द्रव्यों में सड़ने का धर्म नहीं है ।