आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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संज्ञक दोही विभागों में विभक्त किया जाता था । सिवाय गुर्वादि गुणों में भी परिवर्तन और संख्या वृद्धि का यत्न हो रहा था । इन गुण प्रसादाख्य धातुओं के विविध संयोगसे ही द्रव्य प्रसादाख्य धातु बने हुए हैं जिनके कि समुदाय को देह अथवा पुरुष कहते हैं । अस्तु ।
अग्नीषोमवादी, जो कि ओषधि-संज्ञक सचेतन द्रव्यों का गुर्वादि गुणों में वर्गीकरण करते थे; षड् रस प्रयुक्त वर्गीकरण स्वीकार नहीं करते थे । उनका कहना था कि उक्त मधुरादि आस्वाद, गुणमूलक हैं । जैसा कि ‘अग्नीषोमीयत्वाज्जगत्रो रसा द्विविधाः; सौम्या आग्नेयाश्च । तत्र मधुरातिकृष्णयाः सौम्याः । कटुवम्ललवणा आग्नेयाः । मधुराम्ललवणाः स्निग्धानुरवश्च । कटुतिकृष्णयारूक्षाक्षलवश्च । सौम्याः क्षीताः । आग्नेयाश्चोष्णाः । (सु. सू. अ. ४२)
वायोंविद् जोकि गुर्वादि गुण प्रधान अग्नीषोम लोक पक्षीय हैं; ओषधि वर्ग का गुर्वादिगुणों में वर्गीकरण करते थे । मधुरादि आस्वादों को ये भी गुण मूलक ही कहते थे । जैसा कि उनके रसपरिषदस्थ “षड् रसा इति वायोंविदो राजर्षिः, गुरुलघुक्षीतोष्णस्निग्धरूक्षाः” इस वक्तव्य पर से सिद्ध होता है । षड् रसवादियों के प्रति उनका यह भी कथन था कि जब कि इन गुणों के द्वारा ही षड् रस, शारीर-द्रव्य प्रसादाख्य धातुओं के वृद्धिक्षय में कारण हैं तब षड्