आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायोंविद् का रसवाद और विधातु सिद्धांत
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व रसरत्नादि धातुओं में ( अर्थात् समविध ) रहता है और वह अंतरम्नि द्वारा संधुक्षित एवं बलवान् होकर निरंतर समस्त-धातुओं का पाक करता है । पहिले वर्गीकरण वालों की दृष्टि में इस पाचक ऊष्मा का अस्तित्व अम्लप्रपाकजन्य मलसंज्ञक पाचक रस में होना ही चाहिये । फिर भी वे इस ऊष्मा को और तज्जनक अग्नि को मलसंज्ञक पित्र से अलग ही रखते थे । किंतु जो संप्रदाय ऊष्मा को पित्र शब्द से संबोधित करने लग गये थे अथवा ऊष्मा ( ताप ) व अग्नि शब्द समानार्थक मानने लग गये थे वे अंतरम्नि को भी पित्र शब्द से ही संबोधित करना चाहते थे ।
अंतरम्नि के स्वरूप के विषय में भी भिन्न-भिन्न मत दिखाई देते हैं । उदा० भारद्वाजीय धातुपंचकवादानुसार यह अग्निसंज्ञकधातु नित्य अचेतन द्रव्य है, षड्धातुवादानुसार उष्णत्व लक्षण गुण है, शब्दादि गुण प्रधानतावादियों के अनुसार रूपगुणक महाभूत है तो अग्निषोम लोकपक्ष के अनुसार धर्म है । कुछ संप्रदाय इसके ऊष्मा के सहस ही भौतिकान्न और धात्वग्निनों के रूप में प्रभेद करते थे । कुछ संप्रदाय इसका प्रधान स्थान नाभि भाग में तत्रत्य सोम-मंडलांतर्गत सूर्य मंडलों में मानते थे । कुछ संप्रदाय इसका पित्र से अलग अस्तित्व ही नहीं मानते थे । इनके मत से सूर्य मंडलगत अग्नि, प्रदीपवत् नहीं अपितु अवयव विशेष है ।