आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 235 में से
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आयुर्वेद-दर्शन
जिस तरह ओज का स्नेष्म शब्द में और ऊष्मा का पित्त शब्द में सप्तन्वय किया गया उसी तरह धातुप्रसाद का विशेषतः तद्गत 'करणवृत्ति' संज्ञक व्यापारों का वायु शब्द में अतर्भाव किया गया। जैसा कि:—
सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनेव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥
(च. सू. अ. १७)
इस विधान पर से ज्ञात होता है। किंतु यह घटना यका-यक नहीं हुई। अतः उस पर विचार करना आवश्यक है।
षड्ऋसवादी, अन्न के कटु प्रपाक से शरीर में वायु का प्रादुर्भाव मानते थे। यह वायु अधवा वायवीय द्रव्य उनकी दृष्टि से स्नेष्मा व पित्त के सहस्र 'मल' ही था। वे इसको अन्नकिट् का अर्थात् कटुप्रपाक के बाद अन्नरस का पिंडीभूत जो शेष अंश रहता है उसका मल कहते थे। इस वायु को वे शरीरगत समस्त चेष्टाओं का प्रवर्तक समझते थे। क्योंकि उस समय धातुप्रसाद को सिर्फ पंचैन्द्रिय द्रव्य अर्थात् ज्ञानवाहक ही माना जाता था और इस पहिले वर्गीकरण में उसका अलग ही उल्लेख किया जाता था।
इसमें संदेह नहीं कि महास्रोत में अन्नके मधुर अम्ल और कटु ये तीन प्रपाक क्रमशः होते हैं और उनके द्वारा अन्न का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण हो जाता है। कटुप्रपाक